गाथा-१९] [ प३ प्रेम आदर करीश वा तेथी पोताने लाभ छे एम मानीश तो भगवान आत्मानो अनादर थशे. आ त्रणेयमां अभेदपणे अनुभूति ए तो मिथ्यादर्शन छे, अज्ञान छे.
प्रश्नः–अनुभूति छे तोपण अज्ञानी?
उत्तरः–ए अनुभूति छे एमां शुं? ए तो जडनी अनुभूति छे. (अज्ञान छे) एने अनुभूति कहेता ज नथी. अनुभूति एटले अनुभववुं, थवुं. स्वने अनुसरीने थवुं, परिणमवुं. एटले पोताना दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप स्वभावने अनुसरीने थवुं-परिणमवुं तेने आत्मानी अनुभूति कहे छे. परंतु जडने, रागने अनुसरीने थवुं-परिणमवुं ए आत्मानी अनुभूति नथी. पहेलां बीजी गाथामां आ आवी गयुं छे.
आहाहा! शुं कह्युं? जडकर्म अने शरीरादि नोकर्म ए तो पुद्गलपरिणाम छे ज. पण आ आत्मा जे एक ज्ञायकभाव ज्ञाताद्रष्टा चैतन्यचमत्कार वस्तु छे तेमां थता क्षणिक पुण्य-पापना जे भाव ते पण पुद्गलपरिणाम छे, अचेतन छे. ए चैतन्यचमत्कार ज्ञायक-भावरूप आत्मा एक वस्तु अने पुण्य-पापना भाव ए बीजी वस्तु. आ बे वस्तु भिन्न होवा छतां द्रष्टिमां ज्यांसुधी बन्नेमां एकपणानी अभेदबुद्धि छे त्यांसुधी आत्मा अप्रतिबुद्ध-अज्ञानी छे, पछी भले लाखो शास्त्रो भण्यो होय.
अहीं कोई कहे के आमां जरा ढीलुं करो. थोडो रागथी लाभ थाय अने थोडो रागथी लाभ न थाय एम स्याद्वाद करो. तो आपणे बधा एक थई जईए. पण भाई, आमां ढीलुं मूकवानो प्रश्न ज कयां छे? त्रिलोकीनाथ भगवान अने संतो जाहेर करे छे के तुं चैतन्यचमत्कारी वस्तु छे. तारामां चैतन्यचमत्कारनी ईश्वरता भरेली छे. एवा निज आत्मस्वरूपने दया, दान, व्रत, भक्ति आदि शुभभावरूप जाणे अने माने, ए शुभभावो मारा छे अने एथी मने लाभ (धर्म) थशे एम माने तो मिथ्याद्रष्टि, अज्ञानी छे, मूढ छे, जैन नथी.
नवा माणसने जरा आकरुं लागे. पहेलां सांभळ्युं होय ने के व्रत, तप, जात्रा आदि करो एटले धर्म थई जशे. पण कोईनी जात्रा, भाई? बहारनी के अंदरनी? तीर्थे जाओ पण कयुं तीर्थ? आत्मानी अंदर के आत्मानी बहार? कांई खबर न मळे बिचाराने. भगवान आत्मा स्वयं तीर्थरूपे-देवरूपे छे. ए परमानंदस्वभाववाळुं द्रव्य छे. तेमां अंदर जात्रा करे-अंदर जाय ए धर्म छे. बहारनी जात्रा ए तो रागनी क्रिया छे. ए रागक्रिया जे आत्मानो तिरस्कार करवावाळी छे एनाथी लाभ थशे एवी मान्यता तो अप्रतिबुद्ध-अजैननी छे. भाई! व्रत, तप आदि शुभभाव ए तो पुद्गलना परिणाम छे, अचेतन छे. जे भावे तीर्थंकर गोत्र बंधाय ए भाव पुद्गलपरिणाम छे, अचेतन छे. एमां चैतन्यनी जात नथी. तेथी ए शुभरागादि भावकर्म, द्रव्यकर्म तथा शरीरादि नोकर्म ए बाह्य वस्तुओ साथे ज्यांसुधी एकपणानी अभेदपणे अनुभूति छे त्यांसुधी ते अप्रतिबुद्ध छे, बहिरात्मा