प४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ छे. तथा ए त्रणेय पुद्गलपरिणामो बाह्य चीज होवाथी मारा-पोतानामां नथी एम मानी जे पोतानो दर्शन-ज्ञान-चारित्रस्वभावरूप एक ज्ञायकभाव आत्मा छे तेवी श्रद्धा करी तेनी साथे ज एकपणानी निर्मळ ज्ञान, आनंदनी अनुभूति करे ते अंतरात्मा छे. पोताना दर्शन-ज्ञान-चारित्र आदिनी पूर्णदशा प्रगट थवी ए परमात्मा छे. आ बहिरात्मा, अंतरात्मा अने परमात्मानी व्याख्या छे.
पहेलां घडानुं द्रष्टांत आप्युं. हवे दर्पणनुं द्रष्टांत आपीने समजावे छे. ‘जेम रूपी दर्पणनी स्व-परना आकारनो प्रतिभास करनारी स्वच्छता ज छे अने उष्णता तथा ज्वाळा अग्निनी छे....शुं कहे छे? ज्यारे दर्पणनी सामे अग्नि होय त्यारे दर्पणमां जे प्रतिबिंब (अग्नि जेवो आकार) देखाय छे ते दर्पणनी स्वच्छतानी पर्याय छे, पण अग्निनी पर्याय नथी. जे बहारमां ज्वाळा अने उष्णता छे ते अग्निनां छे. परंतु दर्पणमां जे प्रतिबिंब देखाय छे ते तो दर्पणनी स्व-परना आकारनो-स्वरूपनो प्रतिभास करनारी स्वच्छता ज छे. ‘तेवी रीते अरूपी आत्मानी तो पोताने ने परने जाणनारी ज्ञातृता (ज्ञातापणुं) ज छे अने कर्म तथा नोकर्म पुद्गलनां छे.’ शुं कहे छे? राग-दया, दान, पुण्य-पाप आदि जे विकल्प एना आकारे एटले ज्ञेयाकारे ज्ञान थयुं ए तो ज्ञाननी पर्याय छे, पण रागनी नथी. जेम अग्निनी पर्याय अग्निमां रही, पण तेनो आकार (प्रतिबिंब) जे अरीसामां देखाय छे ते अग्निनी पर्याय नथी पण ए तो अरीसानी स्वच्छतानी आकृतिनी पर्याय छे, तेम भगवान आत्मा ज्ञानस्वरूप छे ए ज्ञेयाकार स्वनुं ज्ञान करे छे अने दया, दान, व्रत, आदि विकल्पनुं ज्ञान करे छे. ए परनुं ज्ञान थाय छे ए पोतानी पर्यायमां थाय छे. ए परनुं ज्ञान परमां तो थतुं नथी, पण परने लीधे पण थतुं नथी. पोताना ज्ञाननी स्वच्छत्व शक्तिने लीधे थाय छे.
स्वनुं ज्ञान थवुं अने पर-रागनुं ज्ञान थवुं ए तो पोतानी ज्ञाननी परिणतिनो स्व-परप्रकाशक स्वभाव छे. राग छे तो रागनुं ज्ञान थयुं एम नथी. परंतु ते समये पोतानी ज्ञाननी पर्याय स्वयं रागना ज्ञेयाकाररूपे परिणमती थकी ज्ञानाकाररूप थई छे. ते पोताथी थई छे, पोतामां थई छे, परथी (ज्ञेयथी) नहीं. अरूपी आत्माने तो पोताने अने परनी जाणवावाळी ज्ञातृता छे. ए ज्ञातृता पोतानी छे, पोताथी सहज छे, रागथी नहि अने रागनी पण नहीं. ए राग छे तो ज्ञातृता (जाणपणुं) छे एम नथी. वस्तुनुं सहजस्वरूप ज आवुं छे. अहो! आचार्यदेवे मीठी, मधुरी भाषामां वस्तु भिन्न पाडीने बतावी छे. एमां ठर तो तारुं कल्याण थशे.
जेम रूपी दर्पणनी स्वच्छतामां स्व-परनो प्रतिभास करवानी पोतानी शक्ति छे तेम ज्ञाननी पर्यायमां पोतानुं ज्ञान थवुं अने पर एवा व्यवहाररत्नत्रयनुं ज्ञान थवुं-ए स्वपरनुं जाणवारूप परिणमन थवुं ए पोतानी शक्तिना कारणे छे, पण रागना (व्यवहाररत्नत्रयना) कारणे नहि अने रागमां पण नहि. १२ मी गाथमां आवे छे