Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा-१९] [ पप ने के ते काळे व्यवहार जाणेलो प्रयोजनवान छे. (व्यवहारनयो परिज्ञायम नस्तदात्वे प्रयोजनवान्’) एनुं स्पष्टीकरण छे. पोतानी ज्ञाननी पर्याय पोताने जाणे छे अने रागने जाणे छे. राग छे तो जाणे छे एम नथी, पण ते काळे पोतानी ज्ञानपर्याय ज एवी स्व-परप्रकाशक प्रगट थाय छे. आवो मार्ग, भाई. हवे आ वाणियाने वेपार करवो, बायडी-छोकरांनुं करवुं के आवुं सांभळवा बेसवुं? धूळमांय वेपारादि करतो नथी; ए तो राग अने द्वेष करे छे शुं वेपार करी शके छे? परनी क्रिया करी शके छे? ना. ए (पर) तो जड छे.

घडानुं द्रष्टांत पहेलां दईने हवे दर्पणनुं द्रष्टांत आप्युं. घडाना द्रष्टांतमां तो जेम वर्ण, गंध, रस, स्पर्शमां घडो छे अने घडामां वर्ण, गंध, रस, स्पर्श छे तेम पुण्य- पापमां हुं छुं अने मारामां ए छे एवी अनुभूति ए अज्ञान छे एम कह्युं. आमां कहे छे के लोकालोक छे तो केवळज्ञाननी पर्याय छे एम नथी. ज्ञाननी स्वपरप्रकाशक परिणति ए पोतानी पोताना स्वभावथी थाय छे, लोकालोकथी नहीं. स्व-परनो प्रतिभास थवो ए पोतानुं सहज सामर्थ्य छे. पर छे तो परनो प्रकाश थाय छे एम नथी. आत्मानी तो स्वपरने जाणनारी ज्ञातृता छे अने कर्म अने नोकर्म पुद्गलनां ज छे एम जणाय छे. रागादि कर्म अने शरीरादि नोकर्म पुद्गलनां छे एम पोताथी जाणे अथवा परना उपदेशथी. जेनुं मूळ भेदविज्ञान छे-एटले रागथी अने शरीरादि परथी भिन्न पडवुं ए जेना मूळमां छे-एवी अनुभूति उत्पन्न थशे त्यारे ज आत्मा प्रतिबुद्ध थशे.

* कळश १९ः भावार्थ उपरनुं प्रवचन *

जेम स्पर्शादिमां पुद्गलनो अने पुद्गलमां स्पर्शादिनो अनुभव थाय छे अर्थात् बन्ने (घडाना द्रष्टांतनी जेम) एकरूप अनुभवाय छे तेम ज्यांसुधी आत्माने कर्म-जड कर्म अने अंतरंग रागादि भावकर्म अने नोकर्म-शरीर, मन, वाणी इत्यादिमां आत्मानी अने आत्मामां कर्म-नोकर्मनी भ्रांति थाय छे त्यांसुधी ते अप्रतिबुद्ध छे.

भगवान आनंदस्वरूप ज्ञायक आत्मा छे. एने आ राग ते हुं छुं अने ए राग मारामां छे एवी भ्रांति छे त्यांसुधी ए मिथ्याद्रष्टि छे. हवे केटलाक कहे छे के व्यवहार - राग करतां करतां आत्मानी अनुभूति-निश्चय थाय, पण एम नथी. ए राग तो विकल्परूप छे. अने आत्मा तो निर्विकल्परूप आनंदकंद छे. आत्मा तो शुद्ध पवित्र आनंदघन ज्ञायकरूप छे. अने व्यवहारना शुभभाव तो जडस्वभावी, अशुद्ध, अपवित्र अने दुःखरूप छे. तेथी आत्मा ते राग छे अने राग ते आत्मामां छे एवी एकपणानी मान्यता भ्रम छे. ज्यांसुधी बन्ने एकरूप भासे त्यांसुधी ते अज्ञानी-अप्रतिबुद्ध छे. पुण्य-पापना भाव स्वरूपमां तो नथी, ए तो स्वरूपनो तिरस्कार करवावाळा-अनादर करवावाळा छे. आम छे तोपण ए पोतापणे एकरूप भासे ए अज्ञान छे.