प६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२
हवे ज्यारे ते एम जाणे छे के आत्मा तो ज्ञाता ज छे अने कर्म-नोकर्म पुद्गलनां ज छे त्यारे ज ते प्रतिबुद्ध थाय छे. शुं कह्युं? के आ जाणनार, जाणनार छे ते ज आत्मा छे. जे आ जाणे छे ते ज आत्मा छे. अने पर तरफना लक्षे उत्पन्न थएलां रागादि भावकर्म अने शरीर, मन, वाणी इत्यादि नोकर्म ए पुद्गलना ज छे. जुओ, आ पैसा, बायडी, छोकरां, वेपारंधधो ए तो बहु दूर रही गया. ए तो बधी पुद्गलनी पर्यायनी ज जात छे. अहीं तो दया, दान, व्रतादि विकल्प ऊठे ए पण पुद्गलना ज छे एम वात छे. ए चैतन्य-ज्ञायकनी सत्तामां-ज्ञायकना होवापणामां ए रागनी सत्ता नथी अने रागनी सत्तामां भगवान ज्ञायकनी सत्ता नथी. एम शरीरनी सत्तामां आत्मानी सत्ता नथी अने आत्माना होवापणामां शरीरनी सत्ता नथी. भगवाननी भक्ति थाय, व्रत अने तपनो विकल्प आवे उपवास करुं, ब्रह्मचर्यपाळुं एवो शुभराग आवे ए बधा शुभरागनी सत्तामां चैतन्यस्वरूप आत्मा नथी अने चैतन्यस्वरूप आत्मामां ए शुभरागनी सत्ता नथी. आवुं ज्यारे भेदज्ञान थाय त्यारे ते प्रतिबुद्ध थाय छे. ल्यो, आम रागादिथी भेद करी ज्ञायकमां एकपणे एकाग्रता करे त्यारे प्रतिबुद्ध थाय छे.
जेम अरीसामां अग्निनी ज्वाळा देखाय त्यां एम जणाय छे के-ज्वाळा तो अग्निमां ज छे; अरीसामां नथी पेठी. अरीसामां देखाई रही छे ते अरीसानी स्वच्छता ज छे. शुं कहे छे? तेमां जे अग्निनी ज्वाळा (प्रतिबिंब) देखाय छे ते ज्वाळा अग्निनी नथी अने अग्निथी पण नथी. ए तो अरीसानी स्वच्छतानी दशा छे. ए (ए अरीसाना स्वभावने कारणे छे) अरीसानी स्वच्छतानो स्वभाव ज एवो छे के ते पोतानी स्वच्छताने बतावे अने सामे चीज छे एनो जे पोतामां प्रतिभास थाय एने पण बतावे. खरेखर अरीसामां जे देखाय छे ए ज्वाळा नथी पण ए तो अरीसानी स्वच्छता छे. सामे बरफ होय अने पीगळतो जाय ए अरीसामां देखाय छे. ए बरफने लईने नथी के बरफ एमां छे एम पण नथी. त्यां तो अरीसानी स्वच्छतानुं ज अस्तित्व छे, बरफनुं नथी. तेम जेनी सत्तामां-होवापणामां आनंद अने ज्ञान भर्युं छे तेमां रागनुं जे ज्ञान थाय ए ज्ञान एनी पोतानी सत्तामां छे, पण राग एनी सत्तामां नथी. भगवान आत्मा ज्ञायकज्योति चैतन्यअरीसो छे. एमां शुभाशुभभावनी वृत्तिओ जे छे तेनो प्रतिभास-ज्ञान थाय, ए ज्ञाननुं अस्तित्व तो पोतामां छे, पण शुभाशुभभावनी वृत्तिओनुं अस्तित्व आत्मामां नथी. ए ज्ञानमां ए (शुभाशुभभावनी वृत्तिओ) जणाय अने आत्मा जणाय, पण परने (शुभाशुभभावनी वृत्तिओने) लईने ज्ञाननुं अस्तित्व छे एम नथी. ए राग छे माटे रागनुं अहीं ज्ञान थयुं एम नथी.
झीणो मार्ग, भाई! संप्रदायना माणसो नवा आवे एमने थाय के आ ते शुं कहे छे? आवो धर्म? बापा! जिनेश्वरना मार्गनो धर्म तो आवो छे. चैतन्यबिंब पडयुं छे ने अंदर! तेमां सामी जे चीज छे ए प्रकारना (ज्ञेयना) ज्ञानरूपे परिणमवुं,