Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ लक्षे-स्वभाव तरफना पुरुषार्थथी रागथी भेद करी भेदज्ञानवडे अविचळ अनुभूतिने पामे छे-ते एव ते ज पुरुषो मुकुरवत दर्पणनी जेम प्रतिफलननिमग्नानंतभावस्वभावैः पोतामां प्रतिबिंबित थयेला अनंत भावोना स्वभावोथी संततं निरंतर अविकाराः स्युः विकार रहित होय छे.

शुं कहे छे ए? के अनुभूतिनी-ज्ञाननी जे पर्याय थई ए पर्यायमां पोतामां प्रतिबिंबित थयेला ए (अनंत भावोना-ज्ञेयोना स्वभाव) जाणवामां आव्या; शरीरनी पर्याय, वाणीनी पर्याय रागनी पर्याय-एम बधा अनंत भावो ज्ञाननी पर्यायमां पोतपोताना कारणे जाणवामां आव्या, ए ज्ञेयोनुं ज्ञान थयुं पण ज्ञेयो संबंधी विकार थयो एम नथी. ए ज्ञेयोनुं ज्ञान निर्विकारी छे. ज्ञानमां जे ज्ञेयोना आकार प्रतिभासे छे तेमनाथी (भेदविज्ञानी पुरुषो) रागादि विकारने प्राप्त थता नथी. ए ज्ञाननी पर्यायनुं पोतानुं सहज सामर्थ्य छे. तेथी स्वने अने परने पोताना अस्तित्वमां जाणे छे. तेथी एमां रागने जाणे, शरीरने जाणे माटे ए परज्ञेयना कारणे अहीं (ज्ञानमां) विकार थाय-एम नथी. अनंत ज्ञेयोना स्वभावने जाणे छतां निरंतर तेओ विकार रहित छे.

[प्रवचन नं.ः ६१-६२ * दिनांकः ३०-१-७६ अने ३१-१-७६]