गाथा-१९] [ प९ स्वथी अथवा परना उपदेशथी कोई पण प्रकारे एटले महापुरुषार्थथी ज्यारे आ अनुभूति (ज्ञान) रागनुं लक्ष छोडीने स्वद्रव्यना-ज्ञायकना लक्षे जाय छे त्यारे भेदविज्ञान जेनुं मूळ छे एवी आत्मानी अनुभूति उत्पन्न थाय छे.
‘भेदविज्ञान जेनुं मूळ उत्पत्तिकारण छे’-एम केम कह्युं? तेनुं समाधानः कोई एम कहे के रागनी घणी मंदता करतां करतां (एटले शुभभाव करतां करतां) अनुभूति थाय तो ए वात बराबर नथी. परंतु राग अने आत्मानां भिन्न भिन्न लक्षणो जाणीने, रागनुं लक्ष छोडी प्रज्ञा-छीणी एटले ज्ञाननी परिणति वडे आत्मा अने रागादि बंधने छेदी नाखवा-जुदा पाडवा. जेने आवुं भेदज्ञान थाय ते आवी अविचळ पोताना आत्मानी अनुभूतिने पामे छे. भगवान आत्मानी अनुभूतिनुं मूळ कारण भेदज्ञान कह्युं छे पण व्यवहार साधन-शुभरागने आत्मानुभूतिनुं कारण कह्युं नथी. जुओ, आमां व्यवहार साधन-शुभरागनो निषेध आवी जाय छे.
भाई! आ तो धीरानां काम छे. पहेलां विकल्प द्वारा लक्षमां, प्रतीतिमां तो ले के अंतरनो अनुभव भेदविज्ञानना कारणे थाय छे, परथी भिन्न पडवाना कारणे थाय छे. पर के जेनाथी जुदुं पडवुं छे एनाथी अनुभूति थाय? (न ज थाय.) रागादि जे क्रिया, भले ते पंचमहाव्रतादि होय, एनाथी तो जुदुं पडवुं छे. हवे जेनाथी जुदुं पडवुं छे ए (रागादि) अहीं साधन केम थाय? (न थाय) वस्तुनी स्थिति ज आवी छे, भाई! घणुं गंभीर तत्त्व भर्युं छे. वळी केटलाक एम कहे छे के-रागनी मंदतारूप शुभोपयोग छेल्लो (अनुभव पहेलां) तो होय छे ने? (भले) एनाथी जुदुं, पण शुभोपयोग एटलुं तो साधन थयुं ने? अशुभ उपयोग होय ने भेदज्ञान थाय एम बनतुं नथी माटे अशुभ- उपयोग साधन न थाय, पण शुभ-उपयोग तो साधन खरुं ने? (उत्तर) छेल्लो जे शुभोपयोग होय तेनाथी तो जुदुं पडवानुं छे तो (जुदा पाडवामां) शुभोपयोगे शुं मदद करी? (कांई ज नहि) ए शुभरागना काळे रागथी जे भेदज्ञान ते अनुभूतिनुं कारण थाय छे पण रागने लईने अनुभूति थाय छे एम नथी.
प्रश्नः–‘भेदविज्ञानमूलाम्’ एम लख्युं छे ने? भेदविज्ञान जेनुं मूळ कारण छे. (बीजुं शुभोपयोग उत्तर कारण?) एटले एम बे कारणथी कार्य थाय छे. अष्टसहस्त्रीमां (तत्त्वार्थसूत्रनी टीकामां) बे कारण आवे छे ने?
उत्तरः–ए तो बीजुं होय एनुं ज्ञान कराव्युं छे. बाकी अहीं तो रागथी भेदज्ञान करवुं (ए एक ज) अनुभूतिनी उत्पत्तिनुं कारण छे एम कह्युं छे. छेल्लो शुभराग हतो माटे एनाथी कांईक मदद थई-एम नथी.
हवे कहे छे-जे पुरुषो कोईपण प्रकारे पोताथी अथवा परना उपदेशथी अंतःस्वभावना