Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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प८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ छे माटे आवुं ज्ञान थयुं एम नथी, केमके रागना अस्तित्वथी ज्ञाननी परिणतिनुं अस्तित्व भिन्न छे. आ तो स्वातंत्र्यनो ढंढेरो छे, भाई. रागादि छे ते पर छे, अने पर्यायमां रागादिनुं जे ज्ञान छे ए (स्व) मारुं छे एवो भेदज्ञानस्वरूप अनुभव कयारे थाय? के ज्यारे रागादिनुं लक्ष छोडी स्वना लक्षमां जाय त्यारे एनी परिणतिमां भेदज्ञान थाय. शरीर, मन, वाणी इत्यादि नोकर्म अने रागादि कर्म ए पर पुद्गलना ज छे अने ए ज्ञेयोने जाणनारुं ज्ञान ते मारुं ज्ञायकनुं छे एम भिन्नता जाणी एक ज्ञायकनी सत्तामां ज लक्ष करे तेने भेदज्ञान थाय छे. आवो भेदज्ञानरूप अनुभव कां तो स्वयमेव निसर्गात् अथवा तो उपदेशथी अधिगमात् ज्यारे थाय छे त्यारे ज ते प्रतिबुद्ध थाय छे. थाय छे तो आ रीते ज. (बीजी कोई रीत नथी) निमित्त आवे तो उपादानमां (कार्य) थाय एम नथी. भाई! उपादानना काळे स्व परप्रकाशक परिणति स्वयं पोताथी थाय छे. ते काळे निमित्त होय, पण निमित्तने लईने, निमित्तनी सत्ता छे माटे एने ज्ञान-परिणति उत्पन्न थई एम नथी. आ १९ मी गाथानी टीकानो भावार्थ कर्यो.

हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-

* कळश २१ः श्लोकार्थ उपरनुं प्रवचन *

ये जे पुरुषो स्वतो वा अन्यतो वा पोताथी ज अथवा परना उपदेशथी कथम् अपि हि कोई पण प्रकारे भेदविज्ञानमूलाम् भेदविज्ञान जेनुं मूळ उत्पत्तिकारण छे एवी अनुभूतिम् अचलितम् लभन्ते अविचळ (निश्चळ) पोताना आत्मानी अनभूतिने पामे छेः-शुं कहे छे? जो कोई आत्मा पोताथी ज एवुं भेदज्ञान प्रगट करे-एटले रागथी भिन्न जे ज्ञायकस्वभावरूप निज द्रव्य तेनुं लक्ष करे तो ते अविचळ एटले कदी न पडे एवी आत्मानी अनुभूतिने प्राप्त थाय छे.

अरे भाई! चारे गतिओमां रखडी रखडीने अनंतकाळ गयो. भ्रमणामां ने भ्रमणामां अनंतभवना अनंत अवतार कर्या. ए बधुं भूली गयो छे. पण ए भ्रमणा भांगे (दूर थाय) तो भवना अंत आवे एम छे. ए केम भांगे? तो कहे छे कोई पण प्रकारे एटले महा पुरुषार्थ करीने पण स्वथी सीधो ज भगवान ज्ञायकभाव उपर द्रष्टि करतां ते रागथी भिन्न पडी जाय छे. मोक्ष अधिकार, गाथा २९४ मां शिष्यनो प्रश्न छे के-‘आत्मा अने बंध बन्नेने कंई रीते छेदी शकाय छे?’ तेनुं समाधान आचार्यदेवे कर्युं छे के- “आत्मा अने बंधना नियत स्वलक्षणोनी सूक्ष्म अंतःसंधिमां (अंतरंगनी संधिमां) प्रज्ञाछीणीने सावधान थईने पटकवाथी (नाखवाथी, मारवाथी) तेमने छेदी शकाय छे अर्थात् जुदा करी शकाय छे एम अमे जाणीए छीए.” एटले के प्रज्ञा- ज्ञानपर्यायने रागथी भिन्न करीने पछी द्रव्यमां एक्ता करवाथी परने (रागादिने) छेदी शकाय छे. आम