Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ [सचित्ताचित्तमिश्रं वा] सचित्त स्त्रीपुत्रादिक, अचित्त धनधान्यादिक अथवा मिश्र ग्रामनगरादिक-तेने एम समजे के [अहं एतत्] हुं आ छुं, [एतत् अहम्] आ द्रव्य मुज-स्वरूप छे, [अहम् एतस्य अस्मि] हुं आनो छुं, [एतत् मम अस्ति] आ मारुं छे, [एतत् मम पूर्वेम् आसीत्] आ मारुं पूर्वे हतुं, [एतस्य अहम् अपि पूर्वम् आसम्] आनो हुं पण पूर्वे हतो, [एतत् मम पुनः भविष्यति] आ मारुं भविष्यमां थशे, [अहम् अपि एतस्य भविष्यामि] हुं पण आनो भविष्यमां थईश, - [एतत् तु असद्भूतम्] आवो जूठो [आत्मविकल्पं] आत्मविकल्प [करोति] करे छे ते [सम्मूढः] मूढ छे, मोही छे, अज्ञानी छे; [तु] अने जे पुरुष [भूतार्थ] परमार्थ वस्तुस्वरूपने [जानन्] जाणतो थको [तम्] एवो जूठो विकल्प [न करोति] नथी करतो ते [असम्मूढः] मूढ नथी, ज्ञानी छे.

टीकाः– (द्रष्टांतथी समजावे छेः) जेम कोई पुरुष ईधन अने अग्निने मळेलां

देखी एवो जूठो विकल्प करे के “अग्नि छे ते ईंधन छे, ईंधन छे ते अग्नि छे; अग्निनुं ईंधन छे, ईंधननो अग्नि छे; अग्निनुं ईंधन पहेलां हतुं, ईंधननो अग्नि पहेलां हतो; अग्निनुं ईंधन भविष्यमां थशे, ईंधननो अग्नि भविष्यमां थशे”;-आवो ईंधनमां ज अग्निनो विकल्प करे ते जूठो छे, तेनाथी अप्रतिबुद्ध कोई ओळखाय छे, तेवी रीते कोई आत्मा परद्रव्यमां ज असत्यार्थ आत्मविकल्प (आत्मानो विकल्प) करे के “हुं आ परद्रव्य छुं, आ परद्रव्य मुजस्वरूप छे; मारुं आ परद्रव्य छे, आ परद्रव्यनो हुं छुं; मारुं आ पहेलां हतुं, हुं आनो पहेलां हतो; मारुं आ भविष्यमां थशे, हुं आनो भविष्यमां थईश”;-आवा जूठा विकल्पथी अप्रतिबुद्ध ओळखाय छे.

वळी अग्नि छे ते इंधन नथी, इंधन छे ते अग्नि नथी, -अग्नि छे ते अग्नि ज छे, इंधन छे ते इंधन ज छे; अग्निनुं इंधन नथी, इंधननो अग्नि नथी, -अग्निनो ज अग्नि छे, इंधननुं इंधन छे; अग्निनुं इंधन पहेलां हतुं नहि, इंधननो अग्नि पहेलां हतो नहि, -अग्निनो अग्नि पहेलां हतो, इंधननुं इंधन पहेलां हतुं; अग्निनुं इंधन भविष्यमां थशे नहि, इंधननो अग्नि भविष्यमां थशे नहि, -अग्निनो अग्नि ज भविष्यमां थशे, इंधननुं इंधन ज भविष्यमां थशे;”-आ प्रमाणे जेम कोइने अग्निमां ज सत्यार्थ अग्निनो विकल्प थाय ते प्रतिबुद्धनुं लक्षण छे, तेवी ज रीते “हुं आ परद्रव्य नथी, आ परद्रव्य मुजस्वरूप नथी, -हुं तो हुं ज छुं, परद्रव्य छे ते परद्रव्य ज छे; मारुं आ परद्रव्य नथी, आ परद्रव्यनो हुं नथी, -मारो ज हुं छुं, परद्रव्यनुं परद्रव्य छे; आ परद्रव्य मारुं पहेलां हतुं नहि, आ परद्रव्यनो हुं पहेलां हतो नहि, -मारो हुं ज पहेलां हतो, परद्रव्यनुं परद्रव्य पहेलां हतुं; आ परद्रव्य मारुं भविष्यमां थशे नहि, एनो हुं भविष्यमां थईश नहि, -हुं मारो ज भविष्यमां थईश, आ (परद्रव्य) नुं आ (परद्रव्य) भविष्यमां थशे.”-आवो जे स्वद्रव्यमां ज सत्यार्थ आत्मविकल्प थाय छे ते ज प्रतिबुद्धनुं लक्षण छे, तेनाथी ते ओळखाय छे.