Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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गाथा २०-२१-२२ ] [ ६३

(मालिनी)
त्यजतु जगदिदानीं मोहमाजन्मलीढं
रसयतु रसिकानां रोचनं ज्ञानमुद्यत्।
इह कथमपि नात्मानात्मना साकमेकः
किल कलयति काले कापि तादात्म्यवृत्तिम्।। २२ ।।

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भावार्थः– जे परद्रव्यमां आत्मानो विकल्प करे छे ते तो अज्ञानी छे अने जे

पोताना आत्माने ज पोतानो माने छे ते ज्ञानी छे-एम अग्नि-इन्धनना द्रष्टांत द्वारा द्रढ कर्युं छे.

हवे आ अर्थनुं कलशरूप काव्य कहे छेः-

श्लोकार्थः– [जगत्] जगत अर्थात् जगतना जीवो [आजन्मलीढं मोहम्] अनादि संसारथी मांडीने आज सुधी अनुभव करेला मोहने [इदानीं त्यजतु] हवे तो छोडो अने [रसिकानां रोचनं] रसिक जनोने रुचिकर, [उद्यत् ज्ञानम्] उद्रय थई रहेलुं जे ज्ञान तेने [रसयतु] आस्वादो; कारण के [इह] आ लोकमां [आत्मा] आत्मा छे ते [किल] खरेखर [कथम् अपि] कोई प्रकारे [अनात्मना साकम्] अनात्मा (परद्रव्य) साथे [क्व अपि काले] कोई काळे पण [तादात्म्यवृत्तिम् कलयति न] ताद्रात्म्यवृत्ति (एकपणुं) पामतो नथी, केम के [एकः] आत्मा एक छे ते अन्य द्रव्य साथे एक्तारूप थतो नथी.

भावार्थः– आत्मा परद्रव्य साथे कोई प्रकारे कोई काळे एकताना भावने पामतो नथी. ए रीते आचार्ये, अनादिथी परद्रव्य प्रत्ये लागेलो जे मोह छे तेनुं भेदविज्ञान बताव्युं छे अने प्रेरणा करी छे के ए एकपणारूप मोहने हवे छोडो अने ज्ञानने आस्वादो; मोह छे ते वृथा छे, जूठो छे, दुःखनुं कारण छे. २२. उपोद्घातः–

हवे शिष्य प्रश्न करे छे के ए अप्रतिबुद्ध कई रीते ओळखाय एनुं चिह्न बतावो. तेना उत्तररूप गाथा कहे छेः-

टीकाः– (द्रष्टांतथी समजावे छे) जेम कोई पुरुष इंधन अने अग्निने मळेलां देखी एवो जूठो विकल्प करे के-“अग्नि छे ते इंधन छे, इंधन छे ते अग्नि छे; अग्निनुं इंधन छे, इंधननो अग्नि छे; अग्निनुं इंधन पहेलां हतुं, इंधननो अग्नि पहेलां हतो; अग्निनुं इंधन भविष्यमां थशे, इंधननो अग्नि भविष्यमां थशे;”-आवो इंधनमां ज अग्निनो विकल्प करे ते जूठो छे, तेनाथी अप्रतिबुद्ध-‘लौकिक मूर्ख’ कोई ओळखाय छे.