Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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६४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

तेवी रीते कोई आत्मा परद्रव्यमां ज आत्मविकल्प (आत्मानो विकल्प) करे-हुं आ परद्रव्य छुं, आ परद्रव्य मुजस्वरूप छे. हुं आ राग, शरीर, मन, वाणी इत्यादि परद्रव्य छुं अने ए मारा स्वरूपे छे; आ सामान्य कह्युं. हवे त्रण काळ जोईए. (वर्तमान) मारुं आ राज्य, मारुं शरीर, मारी वाणी, मारो राग इत्यादि मारां आ परद्रव्य छे अने एनो हुं छुं-ए वर्तमान. (भूतकाळ) मारुं आ पहेलां हतुं. हुं पहेलां आनो हतो. ए राग पूर्वे मारो हतो जे वडे आ मनुष्यपणुं मळ्‌युं. लोको कहे छे ने के पूर्वे राग (पुण्य) हतो तो आ मनुष्यपणुं मळ्‌युं अने भगवाननी वाणी सांभळवा मळी. एम पूर्वना रागने पोताना मान्या-ए भूतकाळ. (भविष्य) मारुं आ भविष्यमां थशे अने हुं आनो भविष्यमां थईश. आ जे हुं पुण्य बांधुं छुं एनाथी भविष्यमां मनुष्यपणुं मळशे, जिनवाणी सांभळवा मळशे, ए बधुं मने मळशे. अरे प्रभु! तुं तो ज्ञायकभाव छे ने! तने शुं मळ्‌युं अने शुं मळशे? भाई, ए तारी चीजमां कयां छे? आ मारुं भविष्यमां थशे, हुं एनो थईश, इत्यादि आवा जूठा विकल्पथी ते अप्रतिबुद्ध-मूढ- अज्ञानी-मिथ्याद्रष्टि छे एम ओळखाय छे.

जुओ, पहेलां द्रष्टांत आपे छे के लाकडाने अने अग्निने मळेलां देखीने लाकडुं- इंधन अने अग्निनो स्वभाव भिन्न होवा छतां बेने जे एक माने छे-एटले के इंधन ते अग्नि छे अने अग्नि छे ते इंधन छे एम जे माने छे ते लौकिकमां मूर्ख कहेवाय छे, केम के अग्निनो स्वभाव जे प्रकाश अने उष्णता ते लाकडाना स्वभावथी भिन्न छे. तेम जे कोई आत्मा आ राग, शरीर, मन, वाणी, घर, दीकरा, दीकरी, इत्यादि हुं छुं अने ए मारां छे-एवो परद्रव्यमां ज असत्यार्थ आत्मविकल्प करे छे ते अप्रतिबुद्ध-अज्ञानी छे, मिथ्याद्रष्टि छे.

परद्रव्यमां सचेत, अचेत अने मिश्र एम त्रण प्रकार लीधा छे. संसारी गृहस्थने स्त्री, कुटुंब-परिवार, दीकरा, दीकरी इत्यादि सचेत, शरीर तथा लक्ष्मी आदि अचेत अने दीकरो अने एनां उपकरणो तथा स्त्री अने तेनां कपडां, दागीना आदि बन्ने साथे भेगां ते मिश्र. ए त्रणे जे मारां कहे-माने ते मूढ छे. तेम साधुने जे शिष्य ते सचेत, उपकरण ते अचेत अने उपकरण सहित शिष्य ते मिश्र. बीजी रीते कहीए तो पुण्य-पापना विकल्पो ते सचेत, पुद्गलादि परद्रव्य ते अचेत, अने गुणस्थान-मार्गणास्थाने परिणमेलो माने ते मिश्र. आ सचेत, अचेत अने मिश्र-एम त्रण प्रकारना परद्रव्यमां आ हुं छुं अने ए मारा स्वरूपे छे एम माने ए मूढ-मिथ्याद्रष्टि छे. एना ज्ञानमां साचापणुं आव्युं ज नथी.

प्रश्नः–चौद मार्गणामांथी पोताने शोधवो जोईए ने?

उत्तरः–कयां शोधवो? ए तो पर्यायद्रष्टिए पर्यायपणे केवो छे एनी वात छे.