गाथा २०-२१-२२ ] [ ६प वस्तुपणे तो ज्ञायक चौद मार्गणामां छे ज नहि, भेदमां आत्मा छे ज नहि. अने ए मार्गणास्थानो वस्तुपणे आत्मामां छे ज नहि. अरे! गुणस्थानपणे एने गोतीए तो गुणस्थान पण ज्ञायकमां नथी, अने ज्ञायक आत्मा गुणस्थानमां नथी. आवी वात छे, भाई! झीणी. आ तो टूंकामां समजाव्युं छे. भाई, तुं कोण छो एनी आ वात छे.
हुं आ परद्रव्य छुं अने आ परद्रव्य मारा स्वरूपे छे ए मान्यता अज्ञान छे. आ राग-व्यवहार रत्नत्रयनो विकल्प मारा स्वरूपे छे, आ शरीर मारा स्वरूपे छे, स्त्री मारा स्वरूपे छेः अर्धांगना नथी कहेता? स्त्रीने अडधुं अंग-अडधुं हुं अने अडधुं ए-एम कहे छे. आ तो मूर्खाई छे, धूळेय अर्धांगना नथी. ए आत्मा जुदो, एना शरीरनां रजकण जुदां; एने अने आत्माने संबंध केवो? आ मारो देश, आ मारो पुत्र, आ मारा पिता एम निमित्तथी, व्यवहारथी, बोलाय छे. कोना पिता? कोनो पुत्र? आत्माने बाप केवो अने दीकरो केवो? जीव एक निज ज्ञायकभाव सिवाय जेटली चीज-पुण्य-पाप, गुणस्थान भेद इत्यादि बधां मारां-पोतानां माने ए परद्रव्यने ज पोतानुं माने छे. आ तो पांचमुं गुणस्थान (श्रावक दशा) कोने कहेवुं ए कयां एने खबर छे? पर्यायमां ए वस्तुनुं व्यवहारनयथी ज्ञान करे, पण ए चीज मारी छे अने ए हुं छुं एम माने तो मिथ्याद्रष्टि छे.
‘हुं आ’ एम बे अस्ति तो सिद्ध करी. ‘हुं’ एटले एक अस्ति अने ‘आ’ ए बीजी अस्ति थई. रागादि, पुण्य, पाप, दया, दान, व्रत, शरीर, मन, वाणी, इंद्रिय इत्यादि अस्ति तो छे. वेदान्तीनी पेठे एम तो नथी “ब्रह्म सत्य अने जगत मिथ्या.” आत्मा सत्य अने बीजुं भ्रम एम नथी. हुं अने आ एम बे शब्द वापर्या छे. आ टीका तो बहु टूंकी भाषामां छे पण अंदर घणुं रहस्य भरेलुं छे.
प्रार्थनाः- (अहीं श्रोता विशेष खुलासो करवा माटे विनंती करे छे?) ते आप खोलो. (कृपाळुदेव!)
हा, हळवे हळवे खोलीए.
सवारमां जुओने केवुं आव्युं हतुं? के जैनधर्म कोने कहेवो? (तो कहे छे) के भगवान आत्मा ज्ञायकस्वभावे परिपूर्ण ज्ञान अने आनंदथी भरेलो अथवा वीतरागस्वभावे भरेलो प्रभु छे. एनी परिणतिमां-पर्यायमां वीतरागतानी द्रष्टि, ज्ञान अने शान्ति प्रगटे ए जैनधर्म. मुनिओए त्यां सुधी कह्युं के ए जैनधर्म जयवंत वर्ते छे-एटले के आ ज्ञायक प्रभु मारो नाथ मने हाथ आव्यो छे, मने वीतरागी समकित, वीतरागी ज्ञान अने वीतरागी रमणतारूप जैनधर्म जयवंत वर्ते छे. मने ए जैनधर्म प्रगट छे, कोईकने हशे