६६ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ एम नहि. ओहो! दिगंबर संतोनी गजब शैली! धर्मए वीतरागी दशा छे, एमां व्यवहाररत्नत्रयना रागनुं मिश्रपणुं नथी.
लोको कहे छे के आ बधा छोकराओ भणीगणीने होशियार एन्जिनियर थाय छे, पछी कारखानां करे छे. कहे छे ने के जुओ, आनो दीकरो कारखानां केवां करे छे? शुं ए साचुं हशे? गप छे, कारखानां केवां? भाई, तुं तो ज्ञायकस्वरूप छे ने. प्रभु! तुं एक समयनी पर्याय जेटलो नथी तो पछी रागनो, दीकरा-दीकरीनो, देशनो वगेरेनो केम होय? आ लक्ष्मीवाळो, आबरूवाळो, पैसावाळो, बायडीवाळो, कुटुंबवाळो, कारखानावाळो अहाहा! केटला वाळा वळग्या एने? एक वाळो होय तो राड नाखे छे. वाळो (एक जातनुं जंतु) वाव-कूवाना पाणीमां होय छे ते पीवाथी पगमां लांबो तांतणो नीकळे छे. एक वाळाथी तो राड नाखी जाय छे तो आ तो केटला वाळा?
प्रश्नः–ए वाळो जे पगमां नीकळे ए तो दुःखे छे पण आ तो दुखता नथी ने?
उत्तरः–भाई, वात तो खरेखर एम छे के शरीरादि पर चीज मारी छे ए मान्यता दुःखरूप छे. अने पर चीज-शरीर, पैसा वगेरे उपर लक्ष जाय छे त्यारे पोताना आकुळताना दुःखमां ए (पर चीज) निमित्त छे. आनंदनुं-अतीन्द्रिय आनंदनुं (सुखनुं) कारण तो एकमात्र चैतन्यमूर्ति भगवान छे.
व्यवहाररत्नत्रय आदि परद्रव्यो मारा छे एम माने ते मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. नियमसार गाथा प० मां तो शुद्धरत्नत्रयनी मोक्षमार्गनी वीतरागी निर्मळ पर्यायने परद्रव्य कही छे. त्रिकाळी एक शुद्ध ज्ञायक स्वद्रव्य जे नहि ते बधुं परद्रव्य छे. आत्मा पर्याय जेटलो छे एम माने ते पोताने परद्रव्यरूप माने छे. एटले चैतन्यसूर्य, आनंदनो नाथ, भगवान आत्मा सिवाय एक समयनी पर्यायने, रागने के शरीरादि परद्रव्यने पोतानुं माने ते मूढ मिथ्याद्रष्टि छे. त्यां (नियमसार गाथा प० मां) सम्यग्दर्शन अने वीतरागी चारित्रने परद्रव्य कह्युं छे कारण के जेम स्वद्रव्य (लक्ष) सिवाय बीजा द्रव्यमांथी पोतानी नवी (निर्मळ) पर्याय आवती नथी तेम नवी (निर्मळ) पर्याय निर्मळ पर्यायमांथी पण आवती नथी. त्यां एने (निर्मळ पर्यायने) परद्रव्य कहीने स्वद्रव्यनी द्रष्टि कराववी छे. नवी (निर्मळ) पर्यायनी उत्पत्ति स्वद्रव्यना आश्रये थाय छे. (पण पर्यायना आश्रये थती नथी) पर्यायमांथी पर्याय न आवे. भाई! वीतराग परमेश्वरनो मार्ग गहन छे.
अहाहा! जैनधर्मना परिणमनने पामेला, वीतरागतानी परिणतिमां ऊभेला आ दिगंबर मुनिओ-संतो तो जुओ. तेमने विकल्प आव्यो अने टीका टीकाना कारणे थई. आचार्य भगवान टीकाना छेल्ला श्लोकमां कहे छे के आ टीकानो हुं र्क्ता नथी. मारा माथे आळ नाखशो मा. (हुं तो स्वरूपगुप्त छुं) अरे प्रभु! आवी सरस टीका करीने आप