७८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ अबद्ध [पुद्गलं द्रव्यम्] पुद्गलद्रव्य [मम] मारुं छे. आचार्य कहे छेः [सर्वज्ञज्ञानद्रष्टः] सर्वज्ञना ज्ञान वडे देखवामां आवेलो जे [नित्यम्] सदा [उपयोगलक्षणः] उपयोगलक्षणवाळो [जीवः] जीव छे [सः] ते [पुद्गलद्रव्योभूतः] पुद्गलद्रव्यरूप [कथं] केम थई शके [यत्] के [भणसि] तुं कहे छे के [इदं मम] आ पुद्गलद्रव्य मारुं छे? [यदि] जो [सः] जीवद्रव्य [पुद्गलद्रव्यीभूतः] पुद्गलद्रव्यरूप थई जाय अने [इतरत्] पुद्गलद्रव्य [जीवत्वम्] जीवपणाने [आगतम्] पामे [तत्] तो [वक्तुं शक्तः] तुं कही शके [यत्] के [इदं पुद्गलं द्रव्यम्] आ पुद्गलद्रव्य [मम] मारुं छे. (पण एवुं तो थतुं नथी.)
वेगपूर्वक वहेता अस्वभावभावोना संयोगवशे जे (अप्रतिबुद्ध जीव) अनेक प्रकारना वर्णवाळा *आश्रयनी निकटताथी रंगायेला स्फटिकपाषाण जेवो छे, अत्यंत तिरोभूत (ढंकायेला) पोताना स्वभावभावपणाथी जे जेनी समस्त भेदज्ञानरूप ज्योति अस्त थई गई छे एवो छे, अने महा अज्ञानथी जेनुं हृदय पोते पोताथी ज विमोहित छे-एवो अप्रतिबुद्ध जीव स्वपरनो भेद नहि करीने, पेला अस्वभावभावोने ज (पोताना स्वभाव नथी एवा विभावोने ज) पोताना करतो, पुद्गलद्रव्यने ‘आ मारुं छे’ एम अनुभवे छे. (जेम स्फटिकपाषाणमां अनेक प्रकारना वर्णनी निकटताथी अनेकवर्णरूपपणुं देखाय छे, स्फटिकनो निज श्वेत-निर्मळभाव देखातो नथी तेवी रीते अप्रतिबुद्धने कर्मनी उपाधीथी आत्मानो शुद्ध स्वभाव आच्छादित थई रहृाो छे-देखातो नथी तेथी पुद्गलद्रव्यने पोतानुं माने छे.) एवा अप्रतिबुद्धने हवे समजाववामां आवे छे केः-रे दुरात्मन्! आत्मानो घात करनार! जेम परम अविवेकथी खानारा हस्ती आदि पशुओ सुंदर आहारने तृण सहित खाई जाय छे एवी रीते खावाना स्वभावने तुं छोड, छोड. जेणे समस्त संदेह, विपर्यय, अनध्यवसाय दूर करी दीधा छे अने जे विश्वने (समस्त वस्तुओने) प्रकाशवाने एक अद्वितीय ज्योति छे एवा सर्वज्ञ-ज्ञानथी स्फुट (प्रगट) करवामां आवेल जे नित्य उपयोगस्वभावरूप जीवद्रव्य ते केवी रीते पुद्गलद्रव्यरूप थई गयुं के जेथी तुं ‘आ पुद्गलद्रव्य मारुं छे’ एम अनुभवे छे? कारण के जो कोई पण प्रकारे जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्यरूप थाय अने पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्यरूप थाय तो ज ‘मीठानुं पाणी’ एवा अनुभवनी जेम ‘मारुं आ पुद्गलद्रव्य’ एवी अनुभूति खरेखर व्याजबी छे; पण एम तो कोई रीते बनतुं नथी. ए, द्रष्टांतथी स्पष्ट करवामां आवे छेः जेम खारापणुं जेनुं लक्षण छे एवुं लवण पाणीरूप थतुं देखाय छे अने द्रवत्व (प्रवाहीपणुं) जेनुं लक्षण छे एवुं पाणी लवणरूप थतुं देखाय छे कारण के खारापणुं अने द्रवपणाने साथे रहेवामां __________________________________________________ * आश्रय = जेमां स्फटिकमणि मूकेलो होय ते वस्तु