गाथा २३-२४-२प ] [ ७९
अनुभव भव मूर्तेः पार्श्ववर्ती मुहूर्तम्।
पृथगथ विलसन्तं स्वं समालोक्य येन
त्यजसि झगिति मूर्त्या साकमेकत्वमोहम्।। २३ ।।
__________________________________________________ अविरोध छे अर्थात् तेमां कोई बाधा नथी, तेवी रीते नित्य उपयोग-लक्षणवाळुं जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी अने नित्य अनुपयोग (जड) लक्षणवाळुं पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी कारण के प्रकाश अने अंधकारनी माफक उपयोग अने अनुपयोगने साथे रहेवामां विरोध छे; जड-चेतन कदी पण एक थई शके नहि. तेथी तुं सर्व प्रकारे प्रसन्न था, तारुं चित्त उज्ज्वळ करी सावधान था अने स्वद्रव्यने ज ‘आ मारुं छे’ एम अनुभव. (एम श्री गुरुओनो उपदेश छे.)
सावधान कर्यो छे के जड अने चेतनद्रव्य-ए बन्ने सर्वथा जुदां जुदां छे, कदाचित् कोई पण रीते एकरूप नथी थतां एम सर्वज्ञे दीठुं छे; माटे हे अज्ञानी! तुं परद्रव्यने एकपणे मानवुं छोडी दे; वृथा मान्यताथी बस थाओ.
हवे आ ज अर्थनुं कळशरूप काव्य कहे छेः-
श्लोकार्थः– [अयि] ‘अयि’ ए कोमळ संबोधनना अर्थवाळुं अव्यय छे. आचार्य कोमळ संबोधनथी कहे छे के हे भाई! तुं [कथम् अपि] कोई पण रीते महा कष्टे अथवा [मृत्वा] मरीने पण [तत्त्वकौतूहली सन्] तत्त्वोनो कौतूहली थई [मूर्तेः मुहूर्तम् पार्श्ववर्ती भव] आ शरीरादि मूर्त द्रव्यनो एक मुहूर्त (बे घडी) पाडोशी थई [अनुभव] आत्मानो अनुभव कर [अथ येन] के जेथी [स्वं विलसन्तं] पोताना आत्माने विलासरूप, [पृथक्] सर्व परद्रव्योथी जुदो [समालोक्य] देखी [मूर्त्या साकम्] आ शरीरादिक मूर्तिक पुद्गलद्रव्य साथे [एकत्वमोहम्] एकपणाना मोहने [झगिति त्यजसि] तुं तुरत ज छोडशे.
भावार्थः– जो आ आत्मा बे घडी पुद्गलद्रव्यथी भिन्न पोताना शुद्ध स्वरूपनो अनुभव करे (तेमां लीन थाय), परिषह आव्ये पण डगे नहि, तो घातीकर्मनो नाश करी, केवळज्ञान उत्पन्न करी, मोक्षने प्राप्त थाय. आत्मानुभवनुं एवुं माहात्म्य छे तो मिथ्यात्वनो नाश करी सम्यग्दर्शननी प्राप्ति थवी तो सुगम छे; माटे श्री गुरुओए ए ज उपदेश प्रधानताथी कर्यो छे. २३.