Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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* समयसारः गाथा २३–२४–२प *

हवे अप्रतिबुद्धने समजाववा माटे प्रयत्न करे छेः-जुओ, केटलाक एम कहे छे के आ समयसार मुनिजनो माटे छे, पण अहीं आचार्य भगवान कहे छे- अथ अप्रतिबुद्ध–बोधनाय व्यवसायः क्रियते अप्रतिबुद्धने समजाववा माटे प्रयत्न करवामां आवे छे. जेने सम्यग्दर्शन नथी अने जे रागने, पुण्यने पोताना माने छे एवा मिथ्याद्रष्टिने समजाववा प्रयत्न करीए छीए एम आचार्यदेव कहे छे.

* गाथाः २३–२४–२पः टीका उपरनुं प्रवचन *

‘एकी साथे अनेक प्रकारनी बंधननी उपाधिना अति निकटपणाथी वेगपूर्वक वहेता अस्वभावभावोना संयोगवशे जे (अप्रतिबुद्ध जीव) अनेक प्रकारना वर्णवाळा आश्रयनी निकटताथी रंगायेला स्फटिक-पाषाण जेवो छे.’ जुओ, स्फटिक-पाषाणनी नजीकमां काळा, लाल आदि फूल होय तो जे एनुं प्रतिबिंब स्फटिक पाषाणमां पडे ते स्फटिकनी योग्यताथी पडे छे, पण ए लाल, काळा आदि फूलने लईने पडे छे एम नथी. जो ए लाल आदि फूलने लईने पडे तो लाकडुं मूकीए तो एमां पण पडवुं जोईए. (पण एम नथी.) ए (फूल) तो निमित्त छे अने नैमित्तिकमां जे लाल आदि फूलनुं प्रतिबिंब देखाय छे ए तो स्फटिकनी ते प्रकारनी पोतानी पर्यायनी वर्तमान योग्यताने लीधे छे. तेवी ज रीते कर्मना उद्रयरूप रंगने लीधे आत्मामां राग-द्वेषरूप रंग ऊठे छे एम नथी. ए (कर्मनो उद्रय) तो निमित्त छे अने नैमित्तिक राग-द्वेष जे आत्मामां ऊठे छे ते ते प्रकारनी पोतानी पर्यायनी वर्तमान योग्यताने लीधे छे.

वळी जेम कोई वासणमां स्फटिक मूकयो होय तो वासण जेवा रंगनुं होय तेवा ज रंगनो स्फटिक देखाय छे. ए स्फटिकनी पोतानी पर्यायनी वर्तमान योग्यताने कारणे छे नहि के वासणना रंगने कारणे; तेम एक समयनी पर्याय-विकारी होय के अविकारी- स्वतंत्रपणे ते काळे ते प्रकारे उत्पन्न थवानी योग्यताथी थाय छे. पर्यायनुं वीर्य पर्यायने लईने छे, गुणना वीर्यने लईने पर्यायनुं वीर्य छे एम पण नथी. चिद्दविलासमां आवे छे के पर्यायनी सूक्ष्मता पर्यायने कारणे छे, द्रव्य-गुणना कारणे नहि. त्यां पर्याय एटले मात्र निर्मळ पर्यायनी वात नथी, पण मलिन अने निर्मळ पर्याय स्वतः पोताना कारणे थाय छे एम त्यां पर्यायनी स्वतंत्रता बतावी छे.

स्फटिक अने फूलना संयोगनुं द्रष्टांत हवे जीव अने कर्ममां उतारे छे. जे ज्ञानानंद उपयोगस्वरूप स्वभावभावे छे तेने जीव कहीए. परंतु अनादिथी अनेक प्रकारना एटले आठ प्रकारना कर्मना बंधननी उपाधिनी अति निकटपणाने लईने वेगपूर्वक वहेता अस्वभावभावोना संयोगवशे चैतन्यना उपयोगरूप ज्ञान, आनंद आदि स्वभावभावो तिरोभूत थई (ढंकाई) गया छे. पोते संयोग-निमित्तने (कर्मोदयने) वश थतां शुभाशुभ