गाथा २३-२४-२प ] [ ८१ पुण्य-पापना अनेक प्रकारना जे अस्वभावभावो थाय छे एने वश अज्ञानीनी अनादिनी द्रष्टि छे. जुओ, भगवान आत्मा चैतन्यतत्त्व ज्ञानउपयोगनुं द्रळ छे, ज्ञानानंदस्वरूपी दळ छे, एनी निकटमां आठ प्रकारना कर्मरजकणोनो अनेक प्रकारनो संबंध छे. ए संबंध उपर एनी द्रष्टि होवाथी एने राग-द्वेष अने विकारी भावोनो वेग वहे छे. ए वेगना भावमां रमतो ‘ए वेगनो जे भाव छे ते मारो छे’ एम मानवाथी एने चैतन्य ज्ञायकभाव ढंकाई गयो छे.
भगवान ज्ञायकभावस्वरूप आत्मानो चैतन्यउपयोग तो स्फटिकनी जेम निर्मळ छे. ए उपयोगमां अति निकटना जे अस्वभावभावो-राग-द्वेष, पुण्य-पाप, व्रत, तप, दान, भक्ति तथा काम, क्रोध आदि ते जणाय छे. ए जणातां ए अस्वभावभावो ज हुं छुं एम अज्ञानी माने छे. झीणी वात छे, भाई! आ व्यवहार रत्नत्रयना विकल्प, देव- गुरु शास्त्रनी श्रद्धानो राग, पंचमहाव्रतनो राग, इत्यादि जे बधा व्यभिचारी भावो ते चैतन्यना उपयोगथी भिन्न छे, अचेतनरूप छे छतां अनादि अज्ञानथी अज्ञानी कर्मनी निकटताथी उत्पन्न थयेला ए अस्वभावभावोने पोताना मानी ते हुं छुं एम माने छे.
प्रश्नः– एने शुं आ अण-उपयोगरूप अस्वभावभावो छे एनी खबर नथी?
उत्तरः– हा, खबर नथी. एने भान नथी तेथी तो ते अप्रतिबुद्ध छे.
जेम स्फटिकमणिमां लाल, पीळा आदि फूलनी निकटताथी लाल, पीळी आदि झलक (झांय) जे ऊठे छे एने लईने एनी सफेदाई (निर्मळता) ढंकाई गई छे, तिरोभूत थई गई छे; तेम चैतन्यस्वरूप ज्ञान उपयोगमय वस्तु जे आत्मा तेनो स्वभाव ए पुण्य-पाप आदि अस्वभावभावोने लईने ढंकाई गयो छे. एणे अनंतकाळमां व्रत, तप, दया, दान, भक्ति इत्यादि तो अनंतवार कर्यां छे. परंतु ए तो बधो रागभाव छे, कर्मनी निकटताना वशे थयेलो अस्वभावभाव छे. ए सर्व रागादि मलिनभावमां पोतानुं अस्तित्व स्वीकारवाथी एने चैतन्यरत्न निर्मळानंद उपयोगस्वरूप आत्मा ढंकाई गयो छे.
हवे कहे छे- ‘अत्यंत तिरोभूत (ढंकायेला) पोताना स्वभावभावपणाथी जेनी समस्त भेदज्ञानरूपी ज्योति अस्त थई गई छे एवो छे. अहाहा! एकलो ज्ञायक, ज्ञायक, ज्ञायकभाव जे निर्मळ शुद्ध उपयोगमयस्वभावभाव छे ते रागादि पुण्य-पापना परिणामने वश थयो थको ढंकाई गयो छे अने तेथी एनी समस्त भेदज्ञानज्योति अस्त थई छे. एटले आ रागादि ते हुं नहि, पण आ उपयोग छे ते हुं छुं एवा भेदने प्रकाशनारी भेदज्ञानज्योति एने अस्त थई गई छे. अहाहा! ‘हुं तो चैतन्यस्वरूप छुं’ एवो सूक्ष्ममां सूक्ष्म विकल्प जे ऊठे ए हुं नहि केम के ए विकल्प तो अजीव छे, अचेतन छे, अण-उपयोगरूप छे, पुद्गल छे. आ भेदज्ञान छे. आवो मार्ग माणस समजे नहि