Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 363 of 4199

 

८२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ अने दया पाळवी अने व्रत पाळवां एम लईने बेसी जाय. पण एथी शुं लाभ? ए तो (चार गतिमां) रखडवानुं छे. (ए शुभभावथी) पहेलांय रखडतो हतो, अत्यारेय रखडे छे अने भविष्यमां पण रखडनार छे. अहाहा! भगवान चैतन्यचिंतामणि निर्मळ ज्ञानज्योति अनादिअनंत नित्य ध्रुव स्वभावभावरूप जे आत्मा तेनाथी भिन्न कर्मनी निकटताथी उत्पन्न अस्वभावभावो उपर एनी द्रष्टि होवाथी ए अनादि पर्यायबुद्धि छे. तेथी एने राग अने ज्ञायकनी भिन्नता करनारी भेदज्ञानज्योति अस्त थई गई छे.

अहीं कहे छे के निर्मळ उपयोगस्वरूप भगवान आत्माने कर्मनुं निकटपणुं छे. निकटपणुं एटले एकक्षेत्रावगाह. नियमसार गाथा १८ नी टीकामां आवे छे के-निकटवर्ती अनुपचरित असद्भूत व्यवहारनयथी आत्मा द्रव्यकर्मनो र्क्ता छे-एम अहीं पण निकटपणुं कह्युं छे. भगवान आत्माना एकक्षेत्रावगाहमां जड रजकणो (धूळ) अति निकट छे. ए अति निकटपणाथी वेगपूर्वक वहेता अस्वभावभावो-एम कह्युं छे ने? प्रवचनसारमां पण ‘दोडता पुण्य अने पाप’-एम आवे छे. ‘वेगपूर्वक वहेता’ अने ‘दोडता’ एनो एक ज अर्थ छे के एक पछी एक गति करता चाल्या जता. एटले एक पछी एक वेगथी वहेता एटले पर्यायमां एक पछी एक थता ए पुण्य-पापना भावो ते अस्वभावभावो छे. ए अस्वभावभाव अने आत्माना उपयोगमय स्वभावने भिन्न पाडवानी शक्ति एने अस्त थई गई छे, आथमी गई छे तेथी अज्ञानी-अप्रतिबुद्ध छे. एनी द्रष्टिमां स्वभावभावनो अभाव (तिरोभाव) थयो छे तेथी अस्वभावभावनो सत्कार-स्वीकार थयो छे. तेथी ते अधर्मरूप द्रष्टि छे. अज्ञानीने भेदज्ञानज्योति आथमी गई होवाथी तेने निर्विकार परिणाम न थतां रागादि विकार ज उत्पन्न थाय छे.

हवे कहे छे के-‘अने महा अज्ञानथी जेनुं हृदय पोते पोताथी ज विमोहित छे.’ जुओ वस्तुनो स्वभाव ज्ञायकभाव छे. एनुं एने महा अज्ञान छे. तेथी पोते पोताथी ज विमोहित छे. कर्मना कारणे एने मोह थयो छे एम नथी. अज्ञानीने पर्यायमां जे अस्वभावभावोनी उत्पत्ति थई छे ते पोताना अज्ञानने लईने थई छे, पण कर्मना कारणे नहि.

आम अस्वभावभावथी-रागादिथी स्वभावरूप ज्ञायकने भिन्न पाडनारी भेदज्ञानशक्ति जेने बीडाई गई छे तेथी पोते पोताथी ज विमोहित छे-‘एवो अप्रतिबुद्ध जीव स्वपरनो भेद नहीं करीने पेला अस्वभावभावोने ज पोताना करतो, पुद्गल द्रव्यने “आ मारुं छे” एम अनुभवे छे.’ भगवान ज्ञायक आत्मा जे निर्मळ, उपयोगस्वरूप परम पवित्र जीवस्वभावे छे ते स्व अने आ रागादि भाव जे मलिन, अणउपयोगरूप अपवित्र अजीवस्वभावे छे ते पर-एम स्वपरनो भेद नहीं करीने पेला अस्वभावभावोने-दया, दान, व्रत, भक्ति, पुण्य अने पाप इत्यादि विकारी विभावोने ए पोताना छे एम अज्ञानी