९० ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ भगवाननो उपदेश छे. पण एम नथी, भाई. पर जीवने कोण हणी शके छे? (अर्थात् कोई कोईने हणी शक्तुं नथी.) परंतु तुं ए रागने पोतानो मानीने स्वभावनी हिंसा करे छे ए तारो घात छे, ए पुण्य-पापना विकल्प तो राग छे, अस्वभावभाव छे. अण-उपयोग मय अचेतन जड छे अने दुःखदायक छे. पण एने कयां दरकार छे? आखो दिवस रळवुं, खावुं-पीवुं अने भोगववुं, बस. कदाचित् समय मळतां सांभळवा जाय तो कुगुरुओ एने लूंटी ले. बस एवुं सांभळे के दया पाळो, व्रत करो आदि; एथी कल्याण थई जशे, धूळेय कल्याण नहि थाय, भाई! सांभळने. भगवान सर्वज्ञदेवे जेवो जोयो छे एवा नित्यउपयोग-स्वभावी चैतन्यस्वरूप आत्मानी तने खबर नथी, भाई. ए सदा जाणनार-स्वभावे रहेलो ज्ञायक प्रभु कदीय रागस्वभावे थतो नथी. मीठुं जेम द्रवीने पाणी थाय तेम ए ज्ञानघन द्रवीने कदीय रागपणे थतो नथी. अहो! अद्भुत शैली अने अद्भुत वात छे!
आ शरीर आदि जड ए तो बधा माटीना आकार छे. ए कांई आत्माना नथी, आत्मामां नथी. एमां आत्मा पण नथी. एवा शरीरनी आकृतिने सुंदर देखीने तने होंश अने उत्साह केम आवे छे? ए उत्साह (राग) तो पुद्गलनो उत्साह छे. तारो आत्मा त्यां घात पामे छे. अरे! परमांथी आनंद आवे छे एवुं तें मान्युं छे परंतु तारा आनंदनी खाण तो त्रिकाळी ध्रुव पूर्णानंदनो नाथ प्रभु आत्मा छे. तेमांथी आनंद आवे छे. जेम गोळना रवा होय छे ने? ते रवा बहु तडको पडे एटले पीगळीने रस थाय? शुं ए रस गोळनो होय के (कडवी) काळी जीरीनो? तेम भगवान आत्मा ध्रुव उपयोगमय ज्ञानानंदस्वभावी छे. एमां एकाग्र थतां अंदरथी ज्ञान अने आनंदनो प्रवाह द्रवे छे. जेम गोळ पीगळे तो गळपणपणे पीगळे तेम भगवान आत्मा परिणामे तो ज्ञान अने आनंदनी पर्यायपणे परिणमे. अने एने आत्मा कहेवाय.
अहो! गाथाओ केवी अलौकिक छे! एक-एक गाथा न्याल करी नाखे एवी छे. एनी द्रष्टिने गुलांट खवरावे छे. आम (आत्मामां) जाने, भाई! एम (रागमां) कयां जाय छे? अरे! तने विकल्पनुं अने विकल्प निमित्ते थती शरीरनी क्रिया-उपवासादि वडे शरीर जीर्ण अने शिथिल थाय-एनुं माहात्म्य केम आवे छे? अनंत महिमावंत अंदर अतीन्द्रिय आनंद अने ज्ञाननो नाथ एकला ज्ञान अने आनंदनो रवो पडेलो छे एमां एकाग्रता अने ध्यान कर तो, जेम गोळनो रवो गळपणे पीगळे तेम एमांथी आनंद अने ज्ञान आवशे.
हवे कहे छे केः-‘नित्यउपयोगलक्षणवाळुं जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी अने नित्य अनुपयोग (जड) लक्षणवाळुं पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी कारण के प्रकाश अने अंधकारनी माफक उपयोग अने अनुपयोगने साथे रहेवामां विरोध छे; जड, चेतन कदी पण एक थई शके नहि.’ जुओ, ज्यां प्रकाश छे त्यां अंधकार न होय अने ज्यां अंधकार छे त्यां प्रकाश न होय. तेम भगवान आत्मा ज्यारे