गाथा २३-२४-२प ] [ ८९ (आत्मामां) नथी एवा रागने ज्ञेय बनावीने मान्युं के ते (राग) हुं छुं ए पर्याय मिथ्यात्वनी पर्याय छे. एने मिथ्याद्रष्टि कह्यो छे. जे पर्याये, ते जेनी छे एवा पूर्णानंदना नाथ भगवान आत्मा त्रिकाळी ध्रुवने द्रष्टिमां लईने ए (आत्मा) हुं छुं एम स्वीकार कर्यो ए पर्याय सत्य थई, केमके एमां सत्यनो स्वीकार छे. ए पर्याय सम्यग्दर्शन छे, धर्म छे.
अहाहा! आचार्योए-दिगंबर संतोए असीम करुणा करी छे. तेओ तो जंगलमां वसता हता. एमने कोईनी शुं पडी हती? आ ताडपत्र उपर अक्षर लखाता हता ए जाणता हता. (ए लखता हता एम नहि) लखाई गया पछी कोई आवे तो सोंपी दउं एम कोईनी वाट पण जोवा रहेता नहि. अंकलेश्वरनी बाजुमां सजोद गाम छे. त्यां आपणे गया हता. बहु जूनुं गाम छे. भगवाननी प्रतिमा बहु जूनी छे. आसपास नदीना कांठे हजारो ताडपात्रोनां झाड छे. त्यां जोवा गया हता. मुनिओ त्यां रहेता अने झाड परथी नीचे खरी पडेलां ताडपत्रमां लखता अने त्यां मूकी देता. कोई गृहस्थने खबर होय के मुनिराज ताडपात्र उपर लखे छे तो ते लखेलां ताडपत्रो पडयां होय ते उपाडी लेता. भाई! आ रीते संग्रह थईने आ शास्त्र बन्युं छे. एमां भगवान! कुंदकुंदाचार्य अने अमृतचंद्राचार्यदेवे आ कह्युं छे के-भगवान! तारी प्रभुता शुद्ध उपयोगमय छे. तारी ईश्वरता-सामर्थ्य रागथी अधिक-भिन्न अंदर आत्मामां पडी छे. ३१ मी गाथामां कह्युं छे ने केः-
भाई, रागथी भिन्न-अधिक तारुं ज्ञानतत्त्व अंदर ध्रुव पूर्णानंदथी भरेलुं एक अखंड पडेलुं छे. एनो अनादर करी, एने विषय न बनावतां ‘राग ते हुं छुं’ एम पर्याये रागने विषय बनाव्यो ए द्रष्टि विपरीत छे, मिथ्या छे.
भगवान आत्मा चैतन्यज्ञानघन छे. जेम पहेलां शियाळामां घी जामीने एवां घन थतां के एमां आंगळी तो न खूंपे पण तावेथोय न प्रवेशी शके, वळी जाय. तेम आ भगवान ज्ञानघन एवो छे के तेमां शरीर, मन, वाणी अने कर्म तो एमां न प्रवेशी शके पण तेमां विकल्पनोय प्रवेश नथी. जो आ नित्य-उपयोगस्वरूप भगवानमां विकल्पनो प्रवेश नथी तो ‘हुं राग छुं’ एम तुं केवी रीते कहे छे? जेम खारापणाने अने द्रवपणाने अविरोध छे एटले मीठुं द्रवीने प्रवाहीरूपे थाय छे तेम शुं भगवान ज्ञानघन नित्य उपयोगमय आत्मा द्रवीने रागपणे थाय छे? (नथी थतो.)
(संप्रदायमां) एम बोले के “मा हणो, मा हणो.” व्याख्यान शरू थाय एटले आम बोले. अमे पण बोलता हता के कोई जीवने “मा हणो, मा हणो”-आ