८८ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ अने द्रवपणाने साथे रहेवामां अविरोध छे अर्थात् तेमां कांई बाधा नथी तेवी रीते नित्य उपयोगलक्षणवाळुं जीवद्रव्य पुद्गलद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी अने नित्य अनुपयोग (जड) लक्षणवाळुं पुद्गलद्रव्य जीवद्रव्य थतुं जोवामां आवतुं नथी.’ अहाहा! शुं कहे छे? के जेम खारापणुं अने प्रवाहीपणुं ए बे विरुद्ध नथी (एकसाथे रही शके छे) एम आ नित्य उपयोगलक्षणवाळुं जीवद्रव्य रागरूपे थतुं जोवामां-देखवामां आवतुं नथी. आवी वात छे, भाई. माणसने मूळतत्त्वनी खबर न मळे अने पछी व्रत, तप अने उपवासादि करीने माने के धर्म थई गयो, पण भाई, ए बधुं करी करीने मरी गयो. ए रागनी क्रियाने-पुद्गलने कोई लोको धर्म माने छे पण ए धर्म नथी. कारण के ए शुभभावथी पुद्गल बंधाय अने एना फळमां पुद्गल मळे, पण आत्मा न मळे.
भगवान आत्मा ज्ञायकस्वभाव समजणनो पिंड प्रभु नित्य-उपयोगस्वभाव छे. एने पर्यायमां द्रष्टिमां-लक्षमां लीधा विना पर्यायमां रागनुं लक्ष कर्युं अने रागने अनुभव्यो. तेथी शुं आत्मा रागस्वभावे थई गयो? मीठानुं पाणी थाय एम शुं ज्ञायक रागपणे थई जाय छे? (नहि) आ व्यवहाररत्नत्रय कहे छे ने? ए (व्यवहाररत्नत्रय) नियमसारमां (१२१ मा) कळशमां कहेवामात्र-कथनमात्र छे एम कह्युं छे. एवा व्यवहाररत्नत्रयनो राग तो अनंतवार कर्यो. अहीं कहे छे के शुं ज्ञायक निर्विकल्पस्वरूप आत्मा ए रागना विकल्पपणे थयो छे के जेथी तुं एने धर्म माने छे?
खारापणुं अने द्रवत्वमां विरोध नथी. परंतु नित्य-उपयोगलक्षण जीवद्रव्य अने अनुपयोगस्वरूप पुद्गलद्रव्य-राग ए बेने विरोध छे. ए बे एकरूप थता नथी. चैतन्य उपयोगस्वभाव भगवान आत्मा रागना विपरीत स्वभावे कदीय थतो नथी. जेम मीठानुं पाणी थाय ए तो तें जोयुं छे तेम भगवान ज्ञायक चैतन्य उपयोगस्वरूप वस्तुने अचेतन पुद्गलस्वभावे-रागस्वभावे थती कदीय जोई छे तें? भाई! राग ते हुं एम तें मान्युं छे, पण वस्तुस्वरूप एम नथी. रागपणे जीव कदीय थयो नथी.
जेम सूर्यना किरणमां प्रकाश होय छे तेम चैतन्यसूर्य भगवान आत्माना किरणमां (चेतना) प्रकाश होय छे, एमां राग होतो नथी; केमके राग तो अंधकारमय छे, अंधकार ए कांई सूर्यनुं किरण कहेवाय? (न कहेवाय) तेम रागनो अंधकार ए कांई चैतन्यसूर्यनो अंश कहेवाय? (न कहेवाय) आ वस्तु बधे गोटे चढी गई छे. आ वात बीजे कयांय नथी अने संप्रदायमां कहे छे के आ बधुं निश्चयाभास छे. भाई! एम नथी. बापु! निश्चय मार्ग ज आ छे. चैतन्यसूर्यनुं किरण-पर्याय तो निर्मळ ज्ञानमय होय पण रागमय-अंधकारमय न होय. राग तो मलिन, अचेतन जड पुद्गलरूप छे. तेने अने चैतन्यने तें एक मान्या ए मिथ्यात्वभाव छे.
जे पर्याये, ते जेनी छे एवा स्वने (आत्माने) ज्ञेय न बनावतां जे एनामां