Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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९२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ एमने विरोध छे. ए भावो कदीय आत्मा साथे एकपणे नथी. तेथी ए शरीर, मन, वाणी अने सर्व विकल्पोनुं लक्ष छोडी भगवान ज्ञायक प्रकाशस्वरूप जे उपयोगस्वभावे विराजे छे तेमां अंदरमां जो ने. (तेथी तारुं भलुं थशे.)

प्रवचनसार, गाथा र०० मां आवे छे के ज्ञायक तो ज्ञायकपणे ज रह्यो छे. पण तें मोह वडे अन्यथा अध्यवसित कर्यो छे. एटले के तें एने बीजी रीते मान्यो छे के-हुं (ज्ञायक) रागपणे छुं. वस्तु तो ज्ञायकपणे अनादिअनंत रही छे, पण तें मान्यतामां गोटाळो कर्यो छे. पण तुं माने एटले शुं वस्तु ज्ञायक ज्ञेय (राग, परवस्तु) साथे एकरूप थई छे? (नथी थई) वस्तु ज्ञायक चैतन्यसूर्य तो शांतरसवाळो उपशमरसथी भरेलो शांत-शांत समुद्र-दरियो छे. (जगतनो) सूर्य तो उष्ण छे, पण आ चैतन्यसूर्य तो उपशमरसनो दरियो छे. भक्तिमां आवे छे ने के-“उपशमरस वरसे रे प्रभु! तारा नयनमां.” आत्मा उपशमरसनो कंद अकषायस्वभावी-वीतरागस्वरूपी छे. ए वीतरागस्वभावी वस्तु शुं कदीय रागपणे थाय? (कदी न थाय.)

हवे कहे छेः-‘तेथी तुं सर्व प्रकारे प्रसन्न था, तारुं चित्त उज्ज्वळ करी सावधान था अने स्वद्रव्यने ज “आ मारुं छे” एम अनुभव (एम श्री गुरुओनो उपदेश छे.)’ शुं कहे छे? आनंदमूर्ति भगवान चैतन्यप्रकाशनी झळहळ ज्योति त्रिकाळ एवी ने एवी रही छे, रागपणे-दुःखपणे थई ज नथी. तेथी तुं सर्व प्रकारे (ग्लानि अने निराशा छोडीने) प्रसन्न था. अहाहा! एक वार हा पाड, एक वार आ चैतन्यस्वरूप भगवाननो आदर कर. एक वार तेमां द्रष्टि कर तो अंदरमां एकली वीतरागमूर्ति जिनस्वरूपे भगवान विराजे छे तेनां तने दर्शन थशे. कह्युं छे ने केः-

“जिन सो ही है आत्मा, अन्य सो ही है कर्म;
यहै वचनसे समज ले जिनप्रवचनका मर्म.”

अहो! अमृतचंद्राचार्यदेवे टीकामां अद्भुत अमृत रेडयां छे. कहे छे सर्व प्रकारे प्रसन्न था. वीर्यने उछाळी एवी ने एवी जे ज्ञानानंदस्वरूप चीज पडी छे एनी अंदर जा. तेथी तने आनंद-अमृतनो स्वाद आवशे. करवानुं तो आ छे, भाई. आ कर्युं नहि तो कांई कर्युं नहि. दुनिया आवी सरस वातोने छोडी तकरार, वादविवाद अने झघडामां पडे, पण एमां आत्मा कयां मळे?

अनंतवार नरकमां गयो, निगोदमां गयो, आर्त्तध्यान अने रौद्रध्यान कर्यां, मिथ्यात्वभाव सेव्या, परंतु वस्तु ज्ञायक भगवान तो एवो ने एवो ज रह्यो छे. तेथी कहे छे के तुं प्रमुदित थई, प्रसन्न थई चित्तने उज्ज्वळ कर. परना लक्षे जे तारुं चित्त मलिन छे ते स्वनुं लक्ष करी निर्मळ कर अने अंदर एकरूप ज्ञायकभावमां ज सावधान थई ए स्वद्रव्यने ज ‘आ मारुं छे’ एम अनुभव. अहाहा! स्वद्रव्य जे निज त्रिकाळी