गाथा २३-२४-२प ] [ ९३ ज्ञायकभाव चिदानंदस्वरूप ए ज हुं छुं एम वर्तमान पर्यायने त्यां जडी दे, एमां स्थिर करी दे. अहो! केवी शैली! तद्न सादी भाषामां ऊंचामां ऊंचुं तत्त्व भर्युं छे. कहे छे के- प्रसन्न थई अंतरंगमां सावधान थई परिणतिने एक ज्ञायकमां ज लीन करी दे, डूबावी दे. ल्यो, आ श्री गुरुओनो उपदेश छे.
‘आ अज्ञानी जीव पुद्गलद्रव्यने पोतानुं माने छे तेने उपदेश करी सावधान कर्यो छे के जड अने चेतनद्रव्य-ए बन्ने सर्वथा जुदां जुदां छे.’ः-अज्ञानी जीव कोने कहीए? आ देहमां भगवान आत्मा सच्चिदानंदस्वरूपे विराजमान छे. परंतु पोते कोण अने केवो छे एनुं जेने भान नथी ते अज्ञानी छे. आवो अज्ञानी जीव पुद्गलद्रव्यने पोतानुं माने छे. जेने पोतानी वस्तु जे अनादिथी ज्ञानानंदस्वरूप छे ते ख्यालमां आवी नथी तेथी ते अन्यत्र परमां पोतानुं अस्तित्व माने छे. ते पुण्य-पापना भाव, दया, दान, व्रत, भक्ति आदि शुभभाव के हिंसा, जूठ, चोरी आदि अशुभभाव-जे निश्चयथी पुद्गल छे, स्वभाव नथी-तेने पोताना माने छे.
पोताना सत्त्वनी अनादिथी खबर नहीं होवाथी पोतानी चीजथी विपरीत एवा पुण्य-पापना विकल्पोने-रागने पोतानुं सत्त्व जे माने छे तेने अहीं संतोए उपदेश करी सावधान कर्यो छे. भाई! तुं तो त्रिकाळी ज्ञायक प्रभु चेतनद्रव्य छे. अने जेने तुं पोताना माने छे एवा आ पुण्य-पापना विकल्पो-राग तो अचेतन जड छे, पुद्गलरूप छे. माटे आ तारी मान्यता अज्ञान छे केम के जड अने चेतनद्रव्य सर्वथा जुदा जुदा छे, कोई पण प्रकारे ते बे एक नथी.
जैनपत्रोमां (सामयिकोमां) बधुं घणुं आवे छे के-आ व्यवहार, दया, दान, व्रत, तप, भक्ति, पूजाना जे भाव छे एने पुण्य कही हेय कहो छो. पण एनाथी तो तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बळदेव, इन्द्र आदि पदवी मळे छे अने पछी मोक्ष थाय छे. तो एने (पुण्यने) हेय केम कहेवाय? तमे एने हेय कहो छो ए अज्ञान छे. घणुं लख्युं छे के-भगवाने एने धर्म कह्यो छे अने एनाथी ऊंचां पद मळे अने पछी मोक्षे जाय इत्यादि. अरे भाई! तने खबर नथी, बापु. ए पदवीनां पुण्यो कोने होय छे? जेने आत्मा सच्चिदानंद भगवान अनंत-आनंदनो कंद प्रभु अंदर विराजे छे ते अनुभवमां आव्यो छे, जेने आत्माना ज्ञानानंद स्वभावनो (स्वसंवेदन प्रत्यक्ष) साक्षात्कार थयो छे अने अतीन्द्रिय आनंदनो स्वाद आव्यो छे एवा समक्तिीने कंईक मंदराग (पुण्यभाव) होय छे. एने आ रागना फळमां तीर्थकर, चक्रवर्ती, बळदेव, इन्द्र आदि सात स्थानो जे कह्यां छे ते होय छे. जेने राग हेयबुद्धिए छे अने रागनी इच्छा नथी एवा सम्यग्द्रष्टिने रागना (व्रतादिना) फळमां आ पदो होय छे. परंतु अज्ञानीने तो आ पदो