९४ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२ होय ज नहि, केमके तेने आत्मज्ञान अने सम्यग्दर्शनना अभावमां जे पुण्य आदि भाव थाय तेमां आत्मबुद्धि छे अने ए ज मिथ्यादर्शन अने अज्ञान छे.
अहाहा! आ आत्मा सच्चिदानंद प्रभु शाश्वत वस्तु छे. आ कांई नवी नथी, कोईए करी नथी. अनादिथी छे अने अनंतकाळ रहेनार छे. एवो ए अविनाशी छे. ए अविनाशी वस्तुमां अविनाशी अनंत अनंत शक्तिओ पडी छे. दर्शन, ज्ञान, आनंद, वीर्य, प्रभुत्व, विभुत्व, स्वच्छत्व, उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व आदि अनेक छे.
प्रश्नः– गुणने उत्पाद-व्यय होय नहि. तो उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व गुण केम कह्यो?
उत्तरः– गुणोने तो उत्पाद-व्यय होय नहि ए बराबर छे. गुणो तो ध्रुव ज छे. पण अहीं तो उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व शक्ति छे ए गुण छे. ते ध्रुव छे. ए आत्मद्रव्यनो गुण छे. जेना कारणे द्रव्य नवी पर्यायपणे उपजे अने पूर्वपर्यायपणे नाश पामे अने द्रव्यपणे ध्रुव-कायम रहे. आवी शक्ति (उत्पाद-व्यय-ध्रुवत्व) आत्मामां नित्य रहेली छे. भगवान नित्यानंदस्वरूप आत्मामां जे अनंत शक्तिओ छे ते बधी नित्य छे, ध्रुव छे.
आवा पोताना घरनी वात मूकी दईने जे परनी पंचात करे ते अज्ञानी छे. ए पुण्य-पापना विकल्पोने-रागने पोताना माने छे. ए परद्रव्यने पोतानुं माने छे. एने अहीं सावधान कर्यो के भाई! सावधान था. ‘जड अने चेतनद्रव्य बन्ने सर्वथा जुदां छे, कदाचित् कोई पण रीते एकरूप नथी थतां एम सर्वज्ञे दीठुं छे.’ भगवान आनंदमूर्ति प्रभु चैतन्यस्वरूप आत्मा जुदो छे अने जे पुण्य-पापना विकल्पो ऊठे छे ए अचेतन जड विकल्पो पण जुदा छे.एक चेतन अने बीजी अचेतन होवाथी बन्ने भिन्न चीज छे. हवे आ शरीर, बायडी, छोकरां, गाम अने देश ए तो कयांय दूर छे. एने मारा माने तो शुं मूर्खाईनो पार छे कांई? प्रभु! तुं मूळमांथी भूल्यो. अहीं सूक्ष्म वात करी छे. आ जीव अधिकार छे ने? एटले कहे छे के आ व्रत, तप आदि विकल्पो अजीव छे, जीव नहि. केमके जीव होय तो जुदा पडे नहि. पण ए तो जुदा पडी जाय छे. ए बन्ने सर्वथा जुदा जुदा छे, कोई रीते एक छे एम नथी. जैनशासनमां सर्वथा होय नहि एम केटलाक कहे छे. आ शुं कहे छे? के आत्मा अने राग सर्वथा जुदा छे. अने आ शरीरादि अने आत्मा तो सर्वथा भिन्न ज छे.
आ आत्मा चैतन्यबिंब छे. अने शरीर तो माटी-धूळ जड छे. पण आवुं नक्की करवानी फुरसद कयां छे? एना भान विना दया, दान, व्रतादि करे अने ए पुण्यना फळमां स्वर्गादि के आ धूळनी करोड-बे करोडनी शेठाइ मळे. ए धूळना शेठीआ वैभवना मदमां पाछा मरीने हेठे (नर्क, निगोदमां) चाल्या जाय. (आम चक्कर चाल्या करे छे.) अहीं कहे छे के भगवान सच्चिदानंद आत्मा अने राग तथा शरीर तद्न भिन्न चीज छे. ए कोई पण रीते एक थता नथी एम सर्वज्ञे दीठुं छे; माटे हे अज्ञानी! तुं