गाथा २६ ] [ १०१ रूपथी लोकोनां मन हरी ले छे, [दिव्येन ध्वनिना श्रवणयोः साक्षात् सुखं अमृतं क्षरन्तः] दिव्यध्वनि-वाणीथी (भव्योना) कानोमां साक्षात् सुखअमृत वरसावे छे अने [अष्टसहस्रलक्षणधराः] एक हजारने आठ लक्षणोने धारण करे छे, -एवा छे. २४.
-ईत्यादि तीर्थंकर-आचार्योनी स्तुति छे ते बधीये मिथ्या ठरे छे. तेथी अमारो तो एकांत ए ज निश्चय छे के आत्मा छे ते ज शरीर छे, पुद्गलद्रव्य छे. आ प्रमाणे अप्रतिबुद्धे कहृाुं.
हवे अप्रतिबुद्ध जीव कहे छे तेनी गाथा कहे छेः-
अज्ञानी कहे छे के-तमे बधी आवी वातो करो छो तो जे स्तुति कराय छे ते कोनी कराय छे? शरीरनी. माटे शरीर ते आत्मा छे. तमे ‘शरीर रहित, शरीर रहित’ एम आटलो बधो पोकार शानो करो छो? आम अज्ञानी जीव सामी दलील करे छे.
‘जे आत्मा छे ते ज पुद्गलद्रव्यस्वरूप आ शरीर छे.’ शरीर अने आत्मा बन्ने एक ज छे. वळी तमे जुदा जुदा कहो छो, पण ए अमने बेसतुं नथी. जो एम न होय तो तीर्थंकर-आचार्योनी जे स्तुति करवामां आवी छे ते बधी मिथ्या थाय. ते स्तुति आ प्रमाणे छेः-(आम अज्ञानीए शास्त्रमांथी आधार काढयो).
महाराज! तमे कहो छो के शरीर अने आत्मा बन्ने जुदा छे पण तमारा ज शास्त्रमां शरीरनी स्तुतिथी भगवाननी स्तुति करी छे. जेम केः-
‘ते तीर्थेश्वराः सूरयः वन्द्या’ ते तीर्थंकर-आचार्यो वांदवायोग्य छे. केवा छे ते? ‘ये कान्त्या एव दशदिशः स्नपयन्ति’ पोताना देहनी कान्तिथी दशे दिशाओने धूए छे- निर्मळ करे छे, ‘ये धाम्ना उद्दाममहस्विनाम् धाम निरुन्धन्ति’ अने पोताना तेज वडे उत्कृष्ट तेजवाळा सूर्यादिकना तेजने ढांकी दे छे. भगवाननुं शरीर एवुं होय छे के केवळज्ञान थतां तेना रजकणोनुं तेज सूर्यना तेजथी पण अधिक थई जाय छे. एटले सूर्यना तेजथी पण अधिक देदीप्यमान भगवाननुं परम औदारिक शरीर होय छे. ‘ये रूपेण जनमनः मुष्णन्ति’ पोताना रूपथी लोकोनां मन हरी ले छे. तीर्थंकरना शरीरनुं रूप एवुं होय छे के लोकोनां मनने हरी ले छे. ‘दिव्येन ध्वनिना श्रवणयोः साक्षात् सुखं अमृतं क्षरन्तः’ दिव्यध्वनि-वाणीथी (भव्योना) कानोमां साक्षात् सुख-अमृत वरसावे छे. अने ‘अष्टसहस्त्रलक्षणधराः’ एक हजार ने आठ लक्षणोने धारण करे छे-एवा छे. आ बधां लक्षणो तो शरीरनां छे अने तमे तेने चैतन्य भगवाननी स्तुति कहो छो.