Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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१०२ ] [ प्रवचन रत्नाकर भाग-२

-इत्यादि तीर्थंकर-आचार्योनी स्तुति छे एम तमे कहो छो ते बधीय मिथ्या ठरे छे. तेथी अमारो तो एकांत ए ज निश्चय छे के आत्मा छे ते ज शरीर छे, आ प्रमाणे अप्रतिबुद्धनुं कहेवुं छे.

अहीं शिष्यनो प्रश्न छे के शरीर अने आत्मा तद्न जुदा छे एम तमे कहो छो पण ए वात अमने बेसती नथी. केमके तमे तीर्थंकरनी स्तुति करो छो त्यारे एना शरीरनी अने एनी वाणीनी स्तुति करो छो. जेमकेः-जेमना देहना रूपना प्रकाशमां सूर्यनुं तेज पण ढंकाई जाय छे अने जेनी दिव्यध्वनिथी भव्योना कानोमां साक्षात् सुख- अमृत वरसावे छे इत्यादि. आ बधी शानी स्तुति करो छो? शरीरनी. माटे अमे तो मानीए छीए के शरीर अने आत्मा एक छे. जो देह अने आत्मा एक न होय तो तमे करेली बधी स्तुति मिथ्या ठरे. माटे देह अने आत्मा एक छे एम अमारो निश्चय छे.

वळी कोई एम कहे छे के जो शरीर अने आत्मा एक न होय तो शरीरमां जे रोग आवे छे ते आत्मा केम वेदे? शरीरमां रोगादिनी पीडा आत्मा वेदे छे के नहि? वळी शरीरनी क्रिया-हालवुं, चालवुं इत्यादि कोण करे छे? भाई! ए (आत्मा) शरीरने वेदतो ज नथी, पण शरीरनुं लक्ष करी रागने वेदे छे. अने शरीरनी क्रिया ए तो जडनी क्रिया छे. आत्मा ते क्रिया करतो नथी. तथा जे कर्मना निमित्ते क्रिया थाय छे ते जडकर्मने पण आत्मा अनुभवतो नथी. केमके जड अने चैतन्य वच्चे तो अत्यंताभाव छे. तेथी आत्माने जडकर्मनो अनुभव नथी, पण एना निमित्ते थता मिथ्यात्व अने रागद्वेषनो अनुभव छे.

वळी (अन्य) संप्रदायमां तो शरीर अने आत्मा अत्यंत भिन्न छे एवुं स्पष्ट लखाण ज नथी, एवी शैली ज नथी. त्यां तो एम मानता के आपणे ब्रह्मचर्य पाळीए, संयम पाळीए, पर जीवनी रक्षा करीए इत्यादि बधुं आत्मा करे छे. परजीवनी हिंसा न करवी, परजीवने बचाववो ए “अहिंसा परमो धर्मः” ए आखा सिद्धांतनो सार छे एम कहेता. ए जेणे जाण्युं एणे बधुं जाण्युं.

अहीं तो कहे छे के ए परनी हिंसा अने अहिंसा आ जीव करी शके ज नहि. बंध अधिकारमां आवे छेः-परने हुं मारी शकुं छुं, परने हुं जीवाडी शकुं छुं, बीजाने हुं सुखदुःख दई शकुं छुं, संयोगो, आहार-पाणी वगेरे हुं लई शकुं छुं अने छोडी शकुं छुं, परथी हुं जीवुं छुं, पर बधा रक्षा करनारा छे तेथी हुं जीवुं छुं इत्यादि बधी