Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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परिशिष्टः ३६९

ज्ञानमात्र छे एम बेठुं ज नथी. खरेखर भगवान सर्वज्ञदेवे जोयेलो ने कहेलो आत्मा ज्ञानस्वभावमात्र वस्तु छे एम जेने द्रष्टिमां आव्युं तेने स्वभाव अने स्वभावनो पुरुषार्थ थई गयां, कर्मनो अभाव पण थई गयो तथा जे स्वभावना निर्णयरूप दशा थवा योग्य हती ते ज थई अने ते स्वकाळे क्रमबद्ध ज थई एम भवितव्यता अने काळलब्धि पण थई गयां, आम पांचे समवाय अने तेनो यथार्थ निर्णय एक साथे थई जाय छे. समजाणुं कांई.....?

जुओ, शिष्यनो प्रश्न छे के- आत्मा ज्ञानमात्र छे एम कहेतां ज तेमां अनेक धर्मो सिद्ध थई जाय छे तो भगवान केवळीए अनेकान्तने साधन केम कह्युं? तो कहे छे- अज्ञानीने ज्ञानमात्र आत्मानी खबर नथी, तेथी अनेकान्त-स्याद्वाद वडे तेने उपदेश करवामां आवे छे. एम के आत्मा ज्ञानस्वरूपथी तत् छे, अने परज्ञेयरूपथी नथी, अतत् छे एम जाणतां मारुं ज्ञान परज्ञेयने लईने नथी एम निर्णय थाय छे अने तेथी परावलंबन-निमित्तनुं आलंबन मटी जाय छे, अर्थात् स्वावलंबन प्रगट थाय छे अर्थात् ज्ञान स्वभावी निज स्वरूपनो यथार्थ निर्णय थाय छे.

अरे! लोकोने तत्त्वनो अभ्यास नथी तेथी तेओ स्वतत्त्वने यथार्थ जाणता नथी. कोई तो आ आत्मा सर्वथा एक छे एम माने छे, तो कोई एकांते सर्वव्यापक माने छे, वळी कोई एकांते कर्ता माने छे, तो कोई एकांते नित्य माने छे ईत्यादि. आ प्रमाणे तेओ अवळे चीले चढी गया छे, अने अनंत जन्म-मरण कर्या करे छे. अहा! तेमने सर्वज्ञे कहेलुं तत्त्व-आत्मस्वरूप जे रीते छे ए रीते स्याद्वाद वडे उपदेशवामां आवे छे; केमके वस्तुना यथार्थ ज्ञान ने भान विना एनां सर्व अनुष्ठान-क्रिया संसार अर्थे ज फळे छे.

ज्ञानमात्र आत्मा पोतापणे-ज्ञानस्वभावपणे छे, ने परपणे-जडस्वभावपणे नथी एवुं भान थतां प्रत्येक समये प्रगट थती पर्याय परने लईने नथी, पराधीन नथी पण स्वाधीन प्रगट थाय छे. विकारी परिणमन जे थाय छे ते पण स्वाधीनपणे थाय छे, पण एम नथी के बीजी चीज-निमित्त-कर्म एने पराधीन करे छे. आवुं ज्ञानमात्र वस्तुनुं यथार्थ भान थतां तेने क्रमशः परावलंबी परिणमन मटी जाय छे अने अंते पूर्ण स्वाधीन परिणमन प्रगट थाय छे. आ स्याद्वादनुं फळ छे.

तेथी कहे छे- ‘खरेखर अनेकान्त (स्याद्वाद) विना ज्ञानमात्र आत्मवस्तु ज प्रसिद्ध थई शकती नथी. ते नीचे प्रमाणे समजाववामां आवे छे’ -

‘स्वभावथी ज बहु भावोथी भरेला आ विश्वमां सर्व भावोनुं स्वभावथी अद्वैत होवा छतां, द्वैतनो निषेध करवो अशक्य होवाथी समस्त वस्तु स्वरूपमां प्रवृत्ति अने