Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३७०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० पररूपथी व्यावृत्ति वडे बन्ने भावोथी अध्यासित छे (अर्थात् समस्त वस्तु स्वरूपमां प्रवर्तती होवाथी अने पररूपथी भिन्न रहेती होवाथी दरेक वस्तुमां बन्ने भावो रहेला छे).’

जुओ, शुं कीधुं? के आ विश्व स्वभावथी ज बहुभावोथी भरेलुं छे. एनो अर्थ ए थयो के विश्वमां जे अनंत आत्माओ, अनंतानंत परमाणु आदि छ द्रव्यो छे ए अकृत्रिम छे, कोईए कर्या नथी. ते पदार्थोने कोईए कर्या नथी, तेम ते पदार्थो कोईना कर्ता नथी. वळी दरेक पदार्थनुं स्वभावथी अद्वैत होवा छतां अर्थात् पोते वस्तुपणे एक होवा छतां द्वैतपणुं पण छे, पोते परपणे नथी एवुं द्वैतपणुं रहेलुं छे. वस्तुपणे एक होवा छतां, गुण-पर्यायरूपथी अनेक छे एवा द्वैतनो निषेध थई शकतो नथी; अर्थात् जे अद्वैत छे ते ज द्वैत छे. आ द्वैताद्वैतपणुं कोई परने लईने छे एम नथी. आत्मा स्वपणे छे एवुं अस्तिपणुं-अद्वैतपणुं अने परपणे नथी एवुं नास्तिपणुं-द्वैतपणुं-एवा बे धर्मो वस्तुमां सहज ज सिद्ध छे.

जेने त्रणकाळ-त्रणलोक प्रत्यक्ष जणाया छे एवा सर्वज्ञ परमात्माए एम कह्युं के- भगवान! तुं ज्ञानमात्र एवा अस्तिपणे छो. अहा! आवुं पोताना अस्तिपणानुं ज्ञान जेने थयुं तेने तो अनेकान्त सिद्ध थई जाय छे, अर्थात् तेने ज्ञान साथे आत्मामां अनंत धर्मो रहेला छे एवुं ज्ञान थई जाय छे. पण जेने एनी खबर नथी एवा अज्ञानीओने ज्ञानमात्र कहीने तेनो अनेकान्त-स्याद्वाद साधन वडे निर्णय करावे छे. समजाणुं कांई.....?

आत्मा ज्ञानमात्र छे एम अस्ति कहेतां ज परपणे नथी एम नास्ति सिद्ध थाय छे. वळी ज्ञान छे तो ज्ञाननो आनंद पण भेगो छे एम सिद्ध थाय छे. ज्ञान छे तेनुं अंदरमां प्रयोजनभूत परिणमवारूप वस्तुपणुं पण सिद्ध थाय छे. ज्ञान छे तो पोते पोताना ज्ञानमां आवी शके छे एवो प्रमेयगुण सिद्ध थाय छे; अने प्रमेयने जाणनार पोते प्रमाण छे एम सिद्ध थाय छे. आम, कहे छे, द्वैतनो निषेध करवो अशक्य होवाथी दरेक वस्तु पोताना द्रव्य-गुण-पर्याय स्वरूपमां प्रवृत्ति अने परद्रव्य-गुण-पर्यायरूपथी व्यावृत्ति वडे बन्ने भावोथी अध्यासित छे. अहो! वीतरागना शासन सिवाय आ वात बीजे क्यांय नथी. बीजे तो कल्पित वातो करीने कल्पित मार्गे लोकोने चढावी दीधा छे. अहा! पोते अद्वैत होवा छतां द्वैत केवी रीते छे? तो कहे छे- पोताना द्रव्यमां, पोताना ज्ञानादि अनंत गुणोमां तथा पोतानी परिणतिमां प्रवृत्त थवुं एटले रहेवुं अने परना द्रव्य-गुण-पर्यायपणे न थवुं -ए रीते द्वैतपणुं छे.

वेदांतवाळा जेम बधुं थईने एक कहे छे एम आ अद्वैत नथी. अरे! आत्माने सर्वव्यापक माननार ए लोकोए आत्माने (अभिप्रायमां) खंड खंड करी नाख्यो छे. हा, आत्मा सर्वने जाणे छे, जाणवाना सामर्थ्यरूप छे ए अपेक्षाए तेने सर्वव्यापक