Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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परिशिष्टः ३७१

कहीए, पण क्षेत्र अपेक्षाए बधामां एक (व्यापक) थईने रहे छे एम त्रणकाळमां वस्तु नथी.

अरे! लोकोने बिचाराओने हुं अनंतगुणनो पिंड प्रभु छुं, स्वाधीन छुं, मारी वर्तमान परिणति माराथी थाय छे अने परथी थती नथी ए वात बेसती नथी! वळी ज्ञान थवा काळे सामे ज्ञेय एवुं ज होय छे तेथी तेमने एम भासे छे के सामे ज्ञेय छे माटे मारा ज्ञाननो आकार (परिणाम) आवो थयो. मारी पर्यायनो ज आवा आकारपणे (जाणवापणे) थवानो स्वभाव छे माटे हुं थयो छुं, परथी थयो नथी एम बेसतुं नथी! तेथी ज ए लोको वारंवार संदेह -शंका करे छे के दिव्यध्वनिथी तो लाभ थाय ने? कर्मने लईने आत्मामां विकार थाय ने? ज्ञेयने लईने अहीं ज्ञान थाय ने? लोकोने आ शंका ज (आत्मलाभ थवामां) बहु नडे छे.

जुओ, आ अरीसो छे ने? ते अरीसा सामे श्रीफळ, गोळ, कोलसा आदि जे मूकयुं होय तेवुं अरीसामां देखाय छे. त्यां (खरेखर तो) अरीसानी पोतानी अवस्थारूपे अरीसो थयो छे, अरीसो (श्रीफळ, गोळ आदि) पररूपे थयो नथी. जे (प्रतिबिंब) देखाय छे ते अरीसानी ज अवस्था छे, अने ते सामे जेवी पर चीज छे तेवी थवा छतां, परचीजथी थई नथी. तेम ज्ञानमां जे ज्ञेय जणाय छे ते ज्ञाननी ज अवस्था छे, जेवुं ज्ञेय छे तेवुं जणाय छे छतां ते ज्ञेयथी थई नथी, ज्ञेयकृत नथी. ज्ञान ज पोतानी अवस्थाए तेपणे थयुं छे. समजाणुं कांई....? आ भगवान केवळीनी वाणीमां आवेली वात छे. पण अरे! भ्रान्तिवश लोकोने बेसती नथी!

‘स्वरूपमां प्रवृत्ति ने पररूपथी व्यावृत्ति’ -एम कहीने तो आखो न्याय मूकी दीधो छे. भगवान आत्मा ज्ञानमात्र छे तो एनी साथे ज्ञानमात्रनुं स्वाधीनपणुं, आनंदपणुं पण छे ज. तेथी स्वाधीनपणे आत्मा द्रव्य-गुण ने वर्तमान पर्यायमां आनंदपणे वर्ते छे अने दुःख अने परथी निवर्ते छे. एवुं ज एनुं स्वरूप छे भाई! अहीं कहे छे-प्रभु! तुं आत्मा वस्तु छो ते द्रव्यपणे, ज्ञान, दर्शन आदि अनंतगुणपणे अने तेने जाणनारी-श्रद्धनारी-अनुभवनारी पर्यायपणे सत् छो, ने परद्रव्य अने परभावोथी असत् छो. माटे भगवाननी वाणीने लईने तारामां ज्ञान-श्रद्धाननी पर्याय थई छे एम छे नहि. तारा गुणनुं जे परिणमन समये-समये थाय छे ते ते दशामां तुं प्रवृत्त छो, ने परथी तो व्यावृत्त (भिन्न) छो. माटे परने-देव-गुरु-शास्त्रने लईने तारा गुणनुं परिणमन छे एम छे नहि. तेवी रीते कर्मने लईने विकार थाय छे एम पण छे नहि.

बापु! आ तो वीतराग सर्वज्ञदेवनां वचनो छे भाई! पोतानुं परिणमन स्वथी छे, अने परथी नथी एवुं जाणतां परथी साची उदासीनता थई आवे तेने साचो वैराग्य कहे छे. चाहे सर्वज्ञदेव त्रिलोकीनाथ हो के एनी वाणी हो, एनाथी आत्मा