Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३७२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० व्यावृत्त-निवृत्त ज छे. भाई! भगवान तो पोताना स्वरूपमां ज प्रवृत्त छे, अने आ आत्मा तो एनाथी सदा निवृत्त ज छे. आम पोताथी प्रवृत्ति अने परथी निवृत्ति होवाथी मारी पर्याय माराथी ज थाय, निमित्त के परथी न थाय ए सिद्धांत छे. स्वने जाणतां बीजी चीज छे एनुं ज्ञान थाय ते कोई बीजी चीजने लईने थयुं छे? जराय नहि. ए तो ज्ञान ज पोते तद्रूपे परिणम्युं छे, एमां बीजी चीजनुं कांई ज काम नथी. भाई! परथी आत्मामां कांई थाय के आत्माथी परमां कांई थाय तो तो बधुं भेळसेळ-एक थई जाय; पण एम छे नहि. अहो! आ तो आचार्य अमृतचंद्रदेवे एकलां अमृत रेडयां छे. ‘अमृत वरस्यां रे पंचमकाळमां.’ साक्षात् चैतन्यमूर्ति प्रभु आत्माने हाजर कर्यो छे.

भाई! खोटी तकरार करवी रहेवा दे बापु! एकवार तारी चीज शुं छे ते ख्यालमां ले तो अंदर सर्व समाधान थई जशे. अहाहा....! अंदर जो तो खरो! तुं पोते ज चैतन्यस्वरूप भगवान छो. ‘भग’ नाम ज्ञानानंदनी लक्ष्मी ने ‘वान’ एटले वाळो. अहाहा...! ज्ञानानंदनी लक्ष्मीथी भरपूर अंदर भगवान छो ने प्रभु! तारा आनंद माटे तने बीजी चीजनी गरज क्यां छे? अंतर्मुख थाय के आनंदनो भंडार अंदर खुली जाय छे; आनंदने बहारमां खोजवानी क्यां जरूर छे? अने बहारमां छे पण क्यां? बापु! देव-गुरु-शास्त्रथी पण तारो आनंद नथी. बहारमां देव-गुरु-शास्त्र भले हो, पण अंतर-सन्मुख थया विना देव-गुरु-शास्त्रथी तारा आनंदनुं परिणमन थाय एम छे नहि. अने परथी खसी स्वसन्मुख परिणमतां ज आनंदनुं परिणमन थई जाय छे, केमके पोते ज आनंदस्वरूप छे. समजाणुं कांई...? अहा! आ तो वीतरागनी वाणी बापा! ‘जेणे जाणी तेणे जाणी छे.’ ज्यां परिणमनमां स्वीकार थयो के हुं मारापणे छुं, ने परपणे नथी त्यां एने सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्रनुं निर्मळ परिणमन शरुं थई जाय छे अने ते आनंदनी दशा छे, ते ज धर्म छे.

भाई! एक एक परमाणु पण पोताथी छे, ने परथी-आ आत्माथी के बीजा परमाणुथी नथी. आ एक पाणीनुं बिंदु छे ने! एमां अनंत परमाणु छे. ते दरेक परमाणु पोताना द्रव्य-गुण-पर्यायथी सत् छे, ने परथी (बीजा परमाणुथी) असत् छे. एटले के पोताथी प्रवृत्त छे ने परथी व्यावृत्त छे. हवे एक परमाणु बीजा परमाणुथी असत् होवाथी तेनी पर्यायने करे नहि तो आत्मा जडनी पर्यायने करे ए केम बने? कदीय ना बने; केमके बन्नेमां परस्पर अत्यंताभाव छे. भाई! आत्मानुं सत्पणुं पोतानी वस्तु- गुणने परिणतिथी छे. अने परथी ते असत् छे. आ अनेकान्त छे. स्वनी अपेक्षा पर चीज असत् छे, ने परचीजनी अपेक्षा स्व नाम आत्मा असत् छे. आवी वात!