३८२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१०
ज्ञानी अतत्ने अतत् माने छे. ज्यारे अज्ञानी अतत्ने तत् माने छे. जे भावथी तीर्थंकर नामकर्म बंधाय ते भावथी पण हुं भिन्न-जुदो छुं एम ज्ञानी माने छे, ज्यारे अज्ञानी तीर्थंकर गोत्र बांधे एने लईने केवळज्ञान थाय एम माने छे. जो के अज्ञानीने तीर्थंकर गोत्र बंधातुं नथी, अने जेने तीर्थंकर गोत्र बंधाय छे ते ज्ञानी तेने पोतानुं मानता नथी. जेमके-श्रेणीक राजा सम्यग्द्रष्टि हता, भगवानना (महावीर स्वामीना) समोसरणमां तेमणे तीर्थंकर गोत्र बांध्युं, पण ते तीर्थंकर गोत्र, अने जे भावथी ते बंधायुं ते भाव मारी चीज छे एम ते मानता न हता; केमके जे भावथी तीर्थंकर नामकर्म बंधाय ए तो शुभराग छे, ते रागथी शुं केवलज्ञान थाय? न थाय.
प्रश्नः– ‘पुण्यफला अरहंता....’ अरिहंतपणुं पुण्यनुं फळ छे एम शास्त्रमां आवे छे ने?
उत्तरः– ए तो बाह्य सामग्रीनी वात छे भाई! अरिहंत परमात्माने बहारमां समोसरणनी रचना थाय, दिव्यध्वनि छूटे ईत्यादि पुण्यना फळरूप छे. बाकी केवळज्ञान थयुं ए कांई पुण्यनुं फळ नथी. पुण्य ने पर पदार्थथी आत्माने लाभ थाय एम जे माने छे ते अतत्ने तत् माने छे. धर्मी पुरुष अतत् एवा निमित्तथी के व्यवहारथी -रागथी पोताने आत्मलाभ थाय एम कदी मानता नथी. आ प्रमाणे, कहे छे, पोताना आत्माने विश्वथी भिन्न देखाडतो अर्थात् अंर्तद्रष्टि वडे पोताने विश्वथी भिन्न राखतो अनेकान्त ज तेने पोतानो नाश करवा देतुं नथी, जिवित राखे छे.
आथी विरुद्ध जे शुभभावथी परंपरा मुक्ति थवी माने छे, शरीरनी क्रियाथी धर्म थवानुं माने छे, कर्मथी विकार थाय एम माने छे ते परथी हुं अतत् छुं एम मानतो नथी अने ए रीते ते पोतानो नाश करे छे. आ तत्-अतत्ना बे बोल पूरा थया.
हवे एक-अनेकना बोल.... ‘ज्यारे आ ज्ञानमात्र भाव अनेक ज्ञेयाकारो वडे (- ज्ञेयोना आकारो वडे) पोतानो सफळ (-आखो अखंड) एक ज्ञान-आकार खंडित (- खंड-खंडरूप थयो मानीने नाश पामे छे, त्यारे (ते ज्ञानमात्र भावनुं) द्रव्यथी एकपणुं प्रकाशतो थको अनेकान्त ज तेने जिवाडे छे-नाश पामवा देतो नथी.’
सूक्ष्म वात छे जरी. श्री समंतभद्राचार्य कहे छे ने के-हे प्रभु! एक सेकन्डना असंख्यात भागमां-एक समयमां आपे उत्पाद-व्यय ने ध्रुव जाण्यां ते आपना सर्वज्ञपणानुं चिह्न छे. एक समयमां वस्तु पूर्व अवस्थाथी व्यय थाय, उत्तर-नवी अवस्थाथी उत्पन्न थाय अने वस्तुपणे ध्रुव कायम रहे ए आपे जाण्युं तेथी में नक्की कर्युं के आप सर्वज्ञ छो. अहा! ए सर्वज्ञनी वाणीमां आवेली आ वात छे.
कहे छे- आ ज्ञानस्वरूप आत्मा छे तेनी दशामां अनेक ज्ञेयोनुं जाणपणुं थाय