भिन्न पोतानी चीजनो जे स्वीकार करतो नथी ते बीजे पोतापणुं करीने, जगतने पोतारूप मानीने पोतानो नाश करे छे.
त्यारे ते ज्ञानमात्रभावनुं पररूपथी अतत्पणुं प्रकाशीने विश्वथी भिन्न पोताने मानतो थको ज्ञानी पोतानो नाश थवा देतो नथी. हुं स्वरूपथी ज ज्ञानानंदस्वभावपणे तत् छुं एम पोताथी तत् ने पुण्य-पाप आदि ने शरीर आदि अनंता परज्ञेयोथी अतत् छुं एवी भेदज्ञाननी द्रष्टि धर्मीने खीली गई होय छे. आ रीते धर्मी सत्यार्थ द्रष्टि वडे पोताने जीवतो राखे छे अर्थात् आनंदमय जीवन जीवे छे. अहा! चाहे दया, दान, व्रत, तप आदि पुण्यभावरूप प्रशस्त राग हो के चाहे बहारमां अनुकूळ धन, परिजन, मकान आदि ईष्ट संयोग हो-ए बधुं हुं नहि, एनाथी मारां अनुकूळ धन, परिजन, मकान आदि ईष्ट संयोग हो- ए बधुं हुं नहि, एनाथी मारां ज्ञान, आनंद ने शान्ति नहि - एम परथी अतत्पणुं प्रकाशतो, विश्वथी भिन्न पोताना ज्ञानानंदस्वरूपने ज पोतापणे अनुभवतो धर्मी जीव पोतानो नाश थवा देतो नथी, आवी वात!
‘ज्ञानमात्रभावनुं परथी अतत्पणुं प्रकाशीने’ ..... , ल्यो, हवे आवुं छे त्यां ओला (एक श्वेतांबर साधु) कहे -चश्मां विना ज्ञान न थाय. अरे, आ शुं कहे छे बापु? चश्मां होय तो ज्ञान थाय- आ शुं (अज्ञान) छे? लींबडीमां एक फेरी चर्चा थयेली श्वेतांबर साधु साथे. ए आव्या’ ता त्यां चर्चा करवा. त्यारे कह्युं’ तुं के-भाई! अमे कोई साथे चर्चा-वाद करता नथी. तो ए कहे-
तमे नहि करो तो तमारी किंमत नहि रहे. (एम के तमे चर्चाथी डरी गया) वळी कहे -तमे सिंह छो तो हुंय सिंहनुं बच्चुं छुं. त्यारे कह्युं-
भाई! अमे सिंहेय नथी, बच्चुंय नथी. अमारे वादथी-चर्चाथी काम नथी. पछी थोडीवार पछी ए कहे-
चश्मां होय तो देखाय ने? चश्मां विना देखाय? मे कह्युं- थई गई चर्चा. हवे पोतानी ज्ञाननी पर्याय आंखथी ने चश्मांथी थाय एम मानी, ने पोताथी थाय छे एम मानी नहि ए तो एकलुं अज्ञान छे. शुं पोतानी ज्ञाननी दशा आंखथी ने चश्मांथी-जडथी थाय छे? आ आंख ने चश्मां तो माटी-जड छे; एमां शुं ज्ञान छे? पण अज्ञानी एवुं माने छे के निमित्तथी ने ज्ञेयथी ज्ञान थाय छे. अहीं कहे छे-ज्ञानी, पोताना ज्ञानमात्रभावनुं परथी अतत्पणुं अर्थात् पररूपे नहि होवापणुं प्रकाशीने, विश्वथी भिन्न पोताने ज्ञानपणे प्रगट करीने, पोताने जिवित राखे छे, नष्ट-भ्रष्ट थवा देतो नथी. जुओ आ अनेकान्तनो महिमा! हुं पूर्णानंद प्रभु स्वरूपथी तत् छुं ने परथी अतत् छुं एवो अनेकान्त जीवने जिवाडे छे, आत्मानुभूति पमाडे छे. समजाणुं कांई....?