Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 3831 of 4199

 

३८०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० आदि, तथा आ आरसजडित महेल ने मनोहर वस्त्रादि विषयो ए सघळुंय धूळ माटी छे बापु! ए तारुं रूप-स्वरूप नहि. तुं तो प्रभुता ने आनंदना स्वभावथी भरेलुं एकला चैतन्यनुं बिंब प्रभु छो. एकवार सांभळ नाथ! तारी प्रभुता ने तारो आनंद तारा अंतरमां पूरण भर्यां पडयां छे, छतां परथी मारी प्रभुता छे, ने परमां मारो आनंद छे एम तुं क्यां भरमायो? परथी मारी प्रभुता छे, परमां मारो आनंद छे एम मानवावाळो तो पोताने ज भूली गयो छे, पोताने पोतारूप मानतो नथी. आ ते केवुं अज्ञान! परज्ञेयने लईने मारुं ज्ञान थाय, वज्रवृषभनाराच संहनन होय तो केवळज्ञान थाय, परमांथी विषयोमांथी मने आनंद आवे ईत्यादि परने पोतारूप माननार अज्ञानी जीव अरेरे! पोताना ज्ञानानंदस्वरूपने भूलीने तेनो अनादर अने नाश करे छे, पोताना आनंदमय जीवननो नाश करे छे.

वळी कोई वेदांतवाळा एम माने छे के ज्ञानमां कपासादि (परज्ञेयो) जणाय छे माटे ते (कपासादि) ज्ञाननी जात छे, कारण के ज्ञाननी जात होय ते जणाय; पण आ मान्यता अज्ञान छे. सर्वने (परज्ञेयोने) ज्ञानस्वरूप-आत्मस्वरूप मानवा ए अज्ञान छे, केमके वस्तु एम नथी. पोते (-आत्मा) एक ज्ञानस्वरूप छे, ने ते सिवायनुं बधुं ज परज्ञेय छे. समजाणुं कांई.....?

आ माणसो ध्यान नथी करतां? ध्यान करे छे त्यारे ते पोतानी सन्मुख थाय छे; एटले के पोते जेटला क्षेत्रमां व्यापक छे तेनी सन्मुख थाय छे. मतलब के पोताना क्षेत्रमां ज एनुं होवापणुं छे. छतां विश्वनी जे अनंत चीजो छे ते सर्वमां हुं व्यापक छुं -मारो आत्मा विश्वना बधा क्षेत्रमां व्यापक छे एम कोई माने तो ते अज्ञानी छे, ते पोतानी ज्ञानस्वभावमात्र वस्तुनो अनादर करीने पोतानो घात-हिंसा करे छे. अहा! विश्वनां बधां (अनंता) द्रव्योने पोतारूप-स्वरूप मानी-करीने ते जगतथी भिन्न एवा निज आत्मस्वरूपनो-ज्ञानानंदस्वरूपनो नाश करे छे. बधी चीजोथी (परज्ञेयोथी) पोते भिन्न छे एम जे मानतो ने अनुभवतो नथी ते पोतानो नाश करे छे.

वळी कोईने पांच-पचास हजारनुं मकान नवुं थयुं होय एटले वात-वातमां कहे - एम के भूख्या-तरस्या तो थोडा दि’ रहेवाय पण शुं मकान विना रहेवाय? रोटला विना थोडा दि’ चाले, पण ओटला (मकान) विना केम चाले? आ बधाय मूढेमूढ भेगा थया छे. खबर न मळे के रोटला ने ओटला बधीय परवस्तु छे. शुं आत्मा ओटलामां- मकानमां रही शके छे? ए तो परवस्तु छे; एमां ए केम रहे? एमां एनी रक्षा केम थाय? लोकोने आ तत्त्वनी वात कठण पडे छे. एटले धर्मने नामे बहारनी क्रियाओ-व्रत, तप, दान, भक्ति आदि अनंतकाळथी कर्या करे, पण भाई! ए तो बधो शुभराग छे बापु! ए कांई धर्म नथी, ने धर्मनुं कारणेय नथी. पण शुं थाय? रागथी ने परथी