Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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परिशिष्टः ३७९

अरे भाई! पुण्य-पाप आदि भाव अने आ शरीर, मन, वाणी, दीकरा, दीकरी, कुटुंब-परिवार, धन आदि अनात्मरूप चीजो तारी क्यांथी आवी? ए तारा चैतन्यप्रकाशस्वरूप छे ज नहि. मारी छे, ए तो तारी अनादिकालीन भ्रमणा छे बापु! भ्रमणामां ने भ्रमणामां तें आ सर्व अज्ञानतत्त्वने तारा ज्ञानतत्त्व साथे भेळवीने एकमेक करी दीधां छे. अरे, तारा आत्मानी अपेक्षाए साक्षात् सर्वज्ञपरमात्मा, पंच परमेष्ठी अने शास्त्र ईत्यादि बधुंय अज्ञानतत्त्व छे, केमके ते आ आत्माना ज्ञानरूप नथी, परज्ञेयरूप छे. आ भेदज्ञान छे. पोतानी भिन्न चीज छे एने भिन्न नहि मानतां बीजी चीज (अज्ञानतत्त्व) हुं छुं एम तुं माने ए तो नर्युं अज्ञान छे; ए वडे तो तारा आत्मानो- तारा वास्तविक जीवननो-नाश ज थई रह्यो छे. समजाणुं कांई......? अहो! आ अनेकान्तमां तो आचार्यदेवे आखुं भेदविज्ञान समावी दीधुं छे!

जुओने! एक बाजु राम ने एक बाजु गाम मूकी दीधां छे. एक बाजु अनंत गुणस्वरूप ज्ञानपुंज प्रभु आत्मा ते राम, अने बीजी बाजु पुण्य-पापना विकल्पथी मांडीने शरीर, मन, वाणी, धन, परिजन, देव, गुरु इत्यादि विश्वनी सघळी पर चीज ते गाम छे. ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा विश्वनी आ सघळी परचीजने जाणवावाळो छे, पण ए बधी परचीज पोतानी छे एम एमां क्यां छे? नथी. छतां अज्ञानी जीव जेमां पोतानो ज्ञानस्वभाव नथी एवी आ परचीज-अज्ञानतत्त्व हुं छुं एम अज्ञान-तत्त्वने - परचीजने स्वपणे मानीने-अंगीकार करीने विश्वना ग्रहण वडे अर्थात् पोताना सिवाय अनंत पर पदार्थोना ग्रहण वडे पोताना ज्ञानतत्त्वनो-ज्ञानस्वरूपनो अनादर करे छे, पोतानी शुद्ध चैतन्यमय जीवनशक्तिनो नाश करे छे. आवो आत्मघात ए ज हिंसा छे, अधर्म छे. भाई! धर्म ने अधर्म ए तो अंतरंग मान्यता ने आचरणना आधारे छे, बाह्यथी एनुं माप नीकळे एम नथी.

अहा! भगवान आत्मा अतिन्द्रिय आनंदनो कंद प्रभु छे. क्यांय बीजे (इन्द्रिय के इन्द्रियना विषयोमां) एनो आनंद नथी; आनंदनुं ढीम छे ने पोते! छतां मारो आनंद परमांथी (विषयोमांथी) आवे छे, परथी मने सुख थाय छे एम जे माने छे ते परने पोतारूप-स्वरूप माने छे. आ पैसाथी मने सुख मळे छे, आ मनोहर बाग-बंगलामां मने आराम छे, चैन छे, मझा छे, आ रूपाळा वस्त्रोथी मारी शोभा छे एम जे माने छे ते पैसाने, बाग-बंगलाने ने वस्त्रादिने ज आत्मरूप करे छे, आत्मा माने छे; अने ए रीते ते पोताना आनंदस्वभावनो, आ आनंदस्वभावी आत्मा हुं नहि, आ पैसा आदि परचीज हुं छुं; एम परचीजने अंगीकार करीने, नाश करे छे. समजाणुं कांई......?

आ देह तो माटी-धूळ छे भाई! अने आ मीठां भोजन-लाडवा ने पांतरां