Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३७८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० राखे छे, ज्यारे अज्ञानी जीवो परने ज पोतानुं मानी-मानीने पोतानुं जीवन रोळी- रगदोळी नाखे छे. आ एक बोल थयो.

हवे कहे छे- ‘वळी ज्यारे ते ज्ञानमात्र भाव “खरेखर आ बधुं आत्मा छे” एम अज्ञानतत्त्वने स्व-रूपे (ज्ञानरूपे) मानीने-अंगीकार करीने विश्वना ग्रहण वडे पोतानो नाश करे छे (-सर्व जगतने पोतारूप मानीने तेनुं ग्रहण करीने जगतथी भिन्न एवा पोताने नष्ट करे छे), त्यारे (ते ज्ञानमात्र भावनुं) पररूपथी अतत्पणुं प्रकाशीने (अर्थात् ज्ञान परपणे नथी एम प्रगट करीने) विश्वथी भिन्न ज्ञानने देखाडतो थको अनेकान्त ज तेने पोतानो (-ज्ञानमात्र भावनो) नाश करवा देतो नथी.

शुं कह्युं? ज्ञानमात्रभाव.... जाणग जाणगस्वभाव ते आत्मा छे, अने पुण्य- पापना भाव अने शरीर-मन-वाणी ईत्यादि बधुं अनात्मा छे, अज्ञानतत्त्व छे. ते अज्ञानतत्त्वने-अनात्माने अज्ञानी जीवो आत्मारूप माने छे. अहा! आ पुण्य-पापना भाव ने शरीर, मन, वाणी इत्यादि जे ज्ञानमां परज्ञेयपणे जणाय छे ए बधुं हुं आत्मा छुं एम अज्ञानी माने छे. गजब छे भाई! भगवान आत्मा चैतन्यमूर्ति ज्ञानपुंज प्रभु स्वरूपथी-ज्ञानरूपथी तत् छे, ने पुण्य-पाप आदि तथा शरीरादि परज्ञेयरूपथी अतत् छे. छे तो आम; पण एम न मानतां परज्ञेयोथी-शरीरादिथी हुं तत् छुं एम अज्ञानीओ माने छे अने ए रीते तेओ पोताना चैतन्यस्वरूप आत्मानो लोप-अभाव करे छे.

कोई पूछे के- अज्ञानीने धर्म केम थतो नथी? तो कहे छे- पोते अंदर चैतन्य प्रकाशनो पुंज ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु छे तेने ‘आ हुं छुं’ एम न मानतां आ पुण्य- पापना परिणाम हुं छुं, पुण्यभावथी मने लाभ-धर्म छे, ने जड शरीरनी क्रियाओ (उपवासादि) थाय छे ते मारी छे, शरीर मारुं छे-एम पर एवा अजीव अने आस्रव तत्त्वने ते आत्मा माने छे. पुण्य-पाप आदि विकारी भाव ते आस्रव तत्त्व छे. ते दुःख अने बंधनुं कारण छे, अने भगवान आत्मा सदा आनंदस्वरूप ने अबंधस्वरूप छे. आ रीते आस्रव अने अजीवथी पोताने-आत्माने भिन्नता होवा छतां तेने आत्मस्वरूप मानीने ते पोताना आत्मानो अनादर करे छे. हवे पोतानो ज अनादर-तिरस्कार करे तेने धर्म केम थाय? न थाय.

प्रश्नः– पुण्य-पापना भाव थाय छे तो आत्मानी पर्यायमां? तेने अज्ञानतत्त्व केम कहो?

उत्तरः– भाई! पुण्य-पापना भाव थाय छे तो आत्मानी पर्यायमां, पण तेओ विभाव अर्थात् विपरीत भाव छे. तेओ दुःखरूप अने दुःख अने बंधना कारणरूप छे. वळी तेमां चैतन्यनो-ज्ञाननो अंश नथी. तेथी तेओ चैतन्यथी जुदा अज्ञानतत्त्व छे एम कहीए छीए. समजाणुं कांई........?