-एवा अनुभवरूप ज्ञान ने आनंदनुं परिणमन थाय छे अने एमां द्रव्य, गुण ने पर्याय -त्रणेय-त्रिमय हुं छुं, अने पररूप हुं नथी एम आत्मानो स्वीकार थयो ते ज जीवनुं यथार्थ जीवन छे. अहा! जेणे पोतानी मोजुदगी जे रीते छे ते रीते स्वीकारी तेणे पोतानी जीवती ज्योतने जीवती राखी, तेनुं जीवन सफळ ने धन्य थयुं. अने जेणे ए रीते (ज्ञानमात्रपणे) न स्वीकारतां हुं पुण्यवाळो ने शरीरवाळो ने बायडीवाळो ने धनवाळो ईत्यादि मान्युं तेणे जीवती ज्योतने बुझावी दीधी, पोताना जीवतरनो नाश करी नाख्यो, आत्मघात कर्यो. समजाणुं कांई....?
अहा! स्वरूपथी-ज्ञानस्वभावथी तत्पणे प्रकाशतो थको धर्मी पुरुष ज्ञातापणे परिणमे छे. एटले शुं? के हवे तेने परना-निमित्तना आश्रयनी जरूर भासती नथी. अहा! हवे स्वभावथी संबंध जोडीने तेणे निमित्तनो संबंध तोडी नाख्यो छे, रागथी संबंध तोडी नाख्यो छे. आ प्रमाणे ज्ञानरूपथी पोतानुं तत्पणुं प्रकाशीने अर्थात् ज्ञान ज्ञानपणे ज छे एम प्रगट करीने ज्ञातापणे परिणमनने लीधे अनेकान्त ज तेने जिवाडे छे, अर्थात् तेना जीवतरने नष्ट थवा देतो नथी, पण यथार्थ ज्ञानमय जीवनने प्रगट करे छे, स्वरूपथी तत् छुं ने पररूपथी अतत् छुं एवुं अनेकान्त ज जीवनने सफळ-उत्तम फळ सहित-प्रगट करे छे.
अनेकान्त-अनेक अंत; आत्मा अनेक (अनंत) गुण-धर्मस्वरूप छे. पोते स्वथी तत् ने परथी अतत्-एम आत्मामां तत्-अतत्पणुं छे ए अनेकान्त छे, अने आ अनेकान्त परम अमृत छे. प्रवचनसारमां आवे छे के-आ परिपूर्ण परमानंदस्वरूप प्रभु पोते स्वस्वरूपथी छे ने रागथी ने परथी नथी एवुं भेदविज्ञान पामतां अंदर पर्यायमां आनंदनो स्वाद आवे छे, अमृत झरे छे. अहा! एने धर्म कहीए ने एने ‘अमृतना वेणलां वायां’ कहीए. आ बाईयुं लग्नमां गाय छे ने! के ‘वेणलां भलां वायां रे’ . त्यां तो धूळेय वेणलां वायां नथी सांभळने. अनादिनुं वेण एणे परमां ने रागमां ने पुण्यमां जोडी दीधुं छे. ए तो बधुं झेर बापा! अहीं तो अंदर आनंदकंद प्रभु पोते छे तेने तत्पणे प्रकाशीने -आ ज हुं छुं एम निर्णय करीने- जे आनंदरूपे परिणम्यो तेने आनंदनां-अमृतनां वेणलां वायां. भाई! पूर्णानंदनो नाथ प्रभु पोते छे एनी अंर्तद्रष्टि करी अने परथी द्रष्टि हठावी जे तत्पणे-ज्ञानस्वभावपणे प्रकाश्यो तेनुं जीवन सफळ छे, ते सत्यार्थपणे जीवतो छे, बाकी बधां मडदां ज छे. अष्टपाहुडमां एवा जीवोने चलशब - चालतां मडदां कह्या छे जेने पोतानी स्वभावथी टकती सत्तानो स्वीकार नथी, एनी द्रष्टि नथी, एमां एकता नथी एवा बधा जीवोने रागमां ने परमां एकता छे, ते बधा जीवो मडदा समान ज छे.
ज्ञानी-धर्मी पुरुष पोताना शाश्वत टकता तत्त्वने जोईने पोतानुं जीवन टकावी