Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

< Previous Page   Next Page >


PDF/HTML Page 3827 of 4199

 

३७६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० नथी. बहारमां निमित्त हो, पण निमित्तने लईने आमां निर्मळ परिणमन थयुं छे एम छे नहि. ते (शुद्ध) परिणमन निमित्तने लईने तो थयुं नथी पण (अंदरमां) बीजी पर्यायने लईने के द्रव्य-गुणने लईने थयुं छे एम पण नथी; केमके पर्याय पोते ज षट्कारकरूप थईने परिणमी जाय छे एवो एनो स्वभाव छे. समजाणुं कांई...?

भगवान आत्मा जाणग-जाणग स्वभावी चैतन्यसूर्य छे एवा भावनुं तत्पणुं प्रकाशीने... एटले शुं? के ज्ञानस्वरूपथी हुं छुं, ने विकल्प ने पुण्य ने शरीरादिने लईने हुं नथी एवो निर्णय अंतर्द्रष्टि -ज्ञायकनी द्रष्टि थतां पर्यायमां थाय छे, अने त्यारे अंतरंगमां शुद्ध अंतःतत्त्व अनुभवातां पर्यायमां आत्माना ज्ञान ने आनंदस्वभावनुं शुद्ध परिणमन प्रगट थाय छे. आ ज्ञातानुं परिणमन छे. ते परिणमन परने (देव-गुरुने) लईने थयुं छे एम नथी. ज्ञेयनी पर्याय ते काळे भले हो, पण एने लईने अहीं ज्ञातानुं परिणमन थयुं छे एम छे नहि.

अहाहा...! भगवान, तुं ज्ञानभावमात्र छो ने! ए ज्ञानभावमां अनंतगुणो समाई जाय छे. अहा! आवी ज्ञानभावमात्र वस्तुनो अंतरंगमां तत्पणे-ज्ञानभावपणे अंर्तद्रष्टि वडे स्वीकार करतां पर्यायमां ज्ञातास्वभावना परिणमनरूप अवस्था ज्ञानपणे, आनंदपणे, श्रद्धानपणे शान्तिपणे परिणमी जाय छे. ते परिणमनमां परनो बिलकुल अधिकार नथी. हुं ज्ञानमात्र आत्मा छुं एम जाणीने ज्ञाननी पर्याय ज्यां एमां ठरी त्यां अनंतगुण भेगा निर्मळ उत्पादरूप थाय छे, प्रगट थाय छे. हजु केवळज्ञान थयुं नथी त्यां सुधी कंईक राग छे. पण ए तो परज्ञेय छे; मारा निर्मळ परिणमनमां ए कांई नथी. ल्यो, आवुं ज्ञातानुं ज्ञानमय परिणमन छे. आ तो अंतरनी चैतन्यलक्ष्मीनी वात छे. अंतरनी लक्ष्मी ए ज लक्ष्मी छे, ज्ञान ए ज लक्ष्मी छे, बाकी आ तमारा पैसा आदि तो बधी धूळनी धूळ छे. समजाणुं कांई....?

आ तो भगवानना दरबारमांथी-धर्मसभामांथी आवेली वातु छे. सर्वज्ञ परमात्मा त्रणलोकना नाथ अरिहंत प्रभु दिव्यध्वनि द्वारा उपदेश करे छे. गणधरो, मुनिवरो ने बत्रीस-बत्रीस लाख विमाननो स्वामी शक्रेन्द्र ते सांभळे छे. अहा! ते वाणी केवी होय! जीवोनी दया पाळो ने धर्म थई जशे-शुं भगवाननी वाणीमां आ आवतुं हशे? ना हो; दया पाळो एम तो कुंभार पण कहे छे. बापु! भगवाननी वाणी तो अंतःपुरुषार्थ जगाडनारी अद्भुत अलौकिक होय छे. स्तवनमां आवे छे ने के- ‘जिनेश्वरनी वाणी जेणे जाणी तेणे जाणी छे.’ अहा! ए ॐध्वनि सांभळी गणधर भगवान तेनो अर्थ विचारे छे अने संतो-मुनिवरो ते भावोने समजी आगम रचे छे. एमांनुं आ परमागम शास्त्र छे. तेमां अहीं कहे छे -

कायम टकता त्रिकाळी द्रव्य उपर पर्यायनुं लक्ष जतां ‘आ ज्ञानमात्र आत्मा हुं छुं’