Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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परिशिष्टः ३७प

छुं एम मानीने ते पोतानी ज्ञानसत्तानो अनादर करे छे, पोतानी जे रीते (ज्ञानस्वभावमात्र) मोजुदगी छे ते रीते स्वीकारतो नथी.

भगवान आत्मा ज्ञाता छे, ने शरीरादि पदार्थो ज्ञेय छे; आत्मा द्रष्टा छे, ने शरीर-मन-वाणी आदि द्रश्य छे. ज्ञाता-ज्ञेय, द्रष्टा-द्रश्य-एवो (व्यवहार) संबंध जोईने, पोते ज्ञानस्वभावमात्र होवा छतां, जे ज्ञेयो-शरीर, मन, वाणी, स्त्री-कुटुंब आदि-ज्ञानमां जणाय ते वडे मारा ज्ञाननुं परिणमन छे वा ते हुं छुं एम मानतो थको, पोताने पररूप करीने अज्ञानी पोताना ज्ञानस्वभावनो ईन्कार-तिरस्कार करे छे. शुं करे बिचारो? जे रीते पोते ज्ञानस्वभावमात्र छे ए रीते लक्षमां न आवे त्यां सुधी क्यांक बीजे हुं छुं एम मानवुं पडे, एटले ज्ञानमां जे पुण्य-पाप आदि भावो ने शरीर, मन, वाणी ईत्यादि देखाय छे ते हुं छुं एम पोताने पररूप मानीने, पोताना ज्ञानस्वभावमय जीवननो घात करे छे. आनुं नाम ज वास्तविक हिंसा छे. समजाणुं कांई....? न्याय समजाय छे के नहि? आ तो भेदज्ञाननी वातु बापु! अरे, आवा भेदज्ञान विना एणे व्रत-तप आदि अनंतवार कीधां, महिना-महिनाना उपवास कर्या, बब्बे महिनाना संथारा कर्या, पण ए बधुं शुं काम आवे? विना भेदज्ञान बधुं थोथेथोथां छे बापु!

हवे ज्ञानस्वभावथी पोताने तत्पणुं छे एम प्रकाशीने ज्ञानी-धर्मी पुरुष पोताने जीवाडे छे, नाश थवा देतो नथी एम वात करे छेः

शुं कहे छे? के ज्ञानमात्रवस्तु हुं आत्मा स्वस्वरूपथी-ज्ञानस्वरूपथी तत् छुं एवी प्रतीतिना अभावे हुं परज्ञेयस्वरूप छुं एम मानतो थको अज्ञानी जीव रागद्वेषमोहभावे परिणमीने पोतानो नाश करे छे; त्यारे धर्मी-ज्ञानी पुरुष आ ज्ञानमात्रवस्तु हुं आत्मा स्वस्वरूपथी-ज्ञानस्वरूपथी तत् छुं एम प्रकाशतो थको स्वस्वरूपना निर्मळ ज्ञानश्रद्धानरूप परिणमन वडे पोताने जिवाडे छे. अहा! हुं त्रिकाळ ज्ञानानंदस्वभावी प्रभु आत्मा छुं अने मारुं अस्तिपणुं माराथी ज छे एम अंतरंगमां निर्णय थाय त्यारे अवस्थामां परिणमन शुद्ध थाय छे. आ शुद्ध परिणमन पोताना षट्कारकपणे स्वतंत्र थाय छे हों. जेम आत्मामां ज्ञान, आनंद आदि स्वभाव त्रिकाळ छे, तेम तेमां कर्ता, कर्म, करण, संप्रदान, अपादान, अधिकरण-एम षट्कारकरूप स्वभाव त्रिकाळ छे. आत्मामां कर्ता थवानो कर्म-कार्य थवानो, साधन थवानो, संप्रदान (निर्मळ पर्याय पोते प्रगट करी पोताने देवानो) थवानो, अपादान थवानो, ने अधिकरण थवानो स्वभाव त्रिकाळ छे. तेथी जे निर्मळ ज्ञान-श्रद्धान आदि परिणमन थयुं तेनुं अन्य कोई निमित्त के राग कर्ता ने ते परिणमन एनुं कार्य एम छे नहि. अहा! हुं शुद्ध चैतन्यप्रकाशमय छुं एवी प्रतीति-निर्णयरूप जे कार्य थयुं ते कोई निमित्तनुं-देव-गुरु-शास्त्रनुं कार्य छे एम