Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३७४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० माने छे. खरेखर ज्ञातानुं ज्ञान ज्ञेयने लईने छे एम नहि, पण एवुं ते (मिथ्या) माने छे. आ शरीर, मन, वाणी तथा बीजा पदार्थो अनादिथी बदलता देखाय छे त्यां पोते स्वतत्त्व ज्ञानरूपे ज होवा छतां, स्वतत्त्वने परज्ञेयरूप मानीने, आ परज्ञेय छे ते हुं छुं एम मानीने द्रष्टिमां पोतानी सत्तानो अभाव करे छे. ज्ञेयोने जाणवापणे ज्ञायक पोते ज परिणम्यो छे; ते ज्ञायक उपर नजर-द्रष्टि न करतां सामे जे ज्ञेयोनुं परिणमन जणाय छे ते हुं छुं, तेनाथी हुं छुं एम माने छे, पण हुं जाणनार-जाणनार -जाणनार ज्ञायक ज छुं एम मानतो नथी.

जेम सूका हाडकाने चावता कूतराने हाडकु वागतां मोढामांथी लोही नीकळे छे, ने माने छे के हाडकामांथी लोही आवे छे तेम अज्ञानी प्राणी परिणमता परज्ञेयथी मने ज्ञान थाय छे एम माने छे. आ भगवाननी वाणी आ शास्त्रो छे तेने लईने मारुं ज्ञान थयुं छे एम अज्ञानी माने छे. शास्त्रमां शब्दो जेवा भिन्न भिन्न छे एवुं ज्ञाननुं परिणमन अहीं (-आत्मामां) स्वतः ज थाय छे, तो शब्दोने लईने अहीं ज्ञाननुं परिणमन थयुं एम ते माने छे. कानमां शब्दो पडया ते शब्दोनुं परिणमन छे, ने ते काळे ज्ञान तेने स्वयं स्वतः जाणे छे, पण शब्दोने लईने आ मारा ज्ञाननुं परिणमन थयुं एम अज्ञानी जीव माने छे. हुं एक ज्ञायकतत्त्व छुं, ने मारुं ज्ञेयोने जाणवारूप परिणमन स्वतः सहज थई रह्युं छे एम तेने श्रद्धा नथी. आ रीते ते पोताना ज्ञानतत्त्वने पररूप करीने, पोताने परज्ञेयरूप अंगीकार करीने अज्ञानी थयो थको नाश पामे छे, पोताना ज्ञानस्वभावनो अभाव करे छे.

जगतमां ज्ञानतत्त्व छे, ने एनाथी जुदुं ज्ञेयतत्त्व पण छे. बन्ने भिन्नभिन्न छे. ज्ञेयना अस्तित्वमां ज्ञान नथी, ने ज्ञाननी सत्तामां ज्ञेय नथी. ज्ञाननुं परिणमन ज्ञानना अस्तित्वमां पोताने लईने ज छे. ज्ञेयने लईने जराय नहि; ज्ञानमां ज्ञेय जणायुं माटे ज्ञाननुं परिणमन थयुं छे एम बिलकुल नथी; छतां अज्ञानी ज्ञाननुं परिणमन ज्ञेयकृत छे एम विपरीत मानीने पोताने ज्ञेयरूप करतो थको पोताना ज्ञानतत्त्वनो अभाव करे छे.

भाई! आ आत्मा एक वस्तु छे के नहि? मोजुदगीवाळी चीज छे के नहि? जेम आ शरीर छे तेम आत्मा, एनो जाणनारो मोजुदगीवाळो-अस्तिरूप एक पदार्थ छे. ते आ भगवान आत्मा एना द्रव्ये एटले वस्तुए ज्ञानभाव, एनी शक्तिए-गुणे ज्ञानभाव अने पर्याये पण खरेखर ज्ञानभावे परिणमवापणे छे. पण एना उपर (ध्रुव एक ज्ञानस्वभावी आत्मा उपर) एनी द्रष्टि नहि होवाथी, अनादिथी पोते चैतन्यप्रकाशमां पोतानी शक्तिथी प्रवर्ततो होवा छतां, एना ज्ञानमां जे दया, दान, पूजा, भक्ति आदिनो राग ने शरीर, मन, वाणी इत्यादि परज्ञेय जणाय छे ते हुं छुं, एनाथी हुं