३८४ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० थवुं-अनेकपणुं थवुं ए तो आत्मानो-ज्ञाननो पर्यायस्वभाव छे; ए कांई दोष नथी, न एनाथी आत्मानुं नाश थवापणुं छे. परंतु अज्ञानी अनेक ज्ञेयोनुं जाणपणुं पर्यायमां थाय छे तेने कबुल नहि राखीने तेने छोडी दे छे अर्थात् ए रीते पर्यायनो अस्वीकार करीने ते पोतानो नाश करे छे. आवुं बहु झीणुं! कदी सांभळ्युं न होय. फरीथी-
आ ज्ञानस्वरूपी भगवान आत्मा छे एमां अनंतगुणनी अनंत अवस्थाओ (समये समये) थाय छे. अज्ञानीने ते अनेकपणुं संमत नहि होवाथी एकपणुं ग्रहण करवा माटे अनेकपणारूप जे अवस्थाओ तेनो त्याग करी दे छे अर्थात् पर्याय अपेक्षा अनेकपणुं ते स्वीकारतो नथी. एक ज्ञाननी पर्याय अनंत ज्ञेयने जाणे छे. आवुं वस्तुस्वरूप अज्ञानीने ख्यालमां नहि होवाथी, मारामां अनंतनुं ज्ञान थाय ए मारी चीज नहि एम ते माने छे. आ रीते, जेम आगळ आवी गयुं तेम, अनेक ज्ञेयाकारोना त्याग द्वारा ते पोतानी चीजनो नाश करे छे.
प्रश्नः– आ कोनी वात छे? शुं केवळज्ञानीनी वात छे? उत्तरः– ना, आ छद्मस्थ अज्ञानी तथा सम्यग्ज्ञानीनी वात छे; केवळज्ञानीनी वात नथी, पण केवळज्ञान थवाना साधननी वात छे. अहाहा....! वस्तुने सिद्ध करी छे कांई! अहो! आचार्य अमृतचंद्रदेवे अद्भुत अलौकिक वात करी छे. भगवान कुंदकुंदाचार्यदेवे आ पंचम आरामां तीर्थंकरतुल्य काम कर्युं छे तो आचार्य अमृतचंद्रदेवे आ टीका रचीने तेमना गणधरतुल्य काम कर्युं छे. महा अलौकिक परम अमृतस्वरूप!
अहा! ज्ञाननी पर्याय त्रिकाळी द्रव्यने, तेना अनंतगुणने तथा ते साथे प्रगट थयेली दर्शननी, आनंदनी, श्रद्धानी, शान्तिनी, स्वच्छतानी, प्रभुतानी-बधी पर्यायोने पण जाणे छे; वळी ते पर्याय परने अने रागने पण जाणे. अहा! आवुं ज कोई ज्ञाननी पर्यायनुं स्व-परने प्रकाशवानुं चमत्कारिक सामर्थ्य छे. आम पर्याय अपेक्षा अनेकपणुं जेने कबुल नथी एवो अज्ञानी अनेकपणानो त्याग-अभाव करीने पोतानो नाश करे छे अर्थात् स्वानुभूतिमां प्राप्त थवा योग्य अतीन्द्रिय आनंदथी दूर रहे छे; त्यारे धर्मी-ज्ञानी पुरुष ज्ञानमात्र भावनो पर्यायथी अनेकत्व प्रकाशतो थको पोतानो नाश थवा देतो नथी. आवी वात! समजाणुं कांई...?
अहा! धर्मी माने छे के द्रव्यथी हुं एकरूप होवा छतां पर्यायथी अनेकपणुं होवुं ए मारो स्वभाव छे. अनेकपणुं छे ते आश्रय करवा लायक छे एम नहि, आश्रय करवा योग्य तो एक त्रिकाळी द्रव्य ज छे, पण पर्यायथी अनेकपणुं होवुं ए वस्तुस्थिति छे. द्रव्य-वस्तु जे अपेक्षाए एक छे ते ज अपेक्षा अनेक छे एम नहि, तथा जे अपेक्षाए अनेक छे ते ज अपेक्षाए एक छे एम पण नहि. अहीं तो त्रिकाळी ध्रुव द्रव्यरूपथी एक होवा छतां पर्यायरूपथी तेने अनेकपणुं छे एम वात छे, अने