धर्मी आ वास्तविक वस्तु-स्थितिने स्वीकारतो थको यथार्थद्रष्टि वडे पोतानुं जीवन सुरक्षित राखे छे, नाश थवा देतो नथी.
पर्याय विकारी हो के अविकारी, ए अनेक पर्यायपणे थवानो मारो स्वभाव छे, ए अनेक पर्यायपणे हुं छुं, अर्थात् मारी विकारी पर्याय पण परने लईने थई छे एम नथी- आवुं धर्मात्माने (अंतरसन्मुखना वलणमां) ज्ञान थाय छे. तेने अनेकपणामां जे रागादि ने निर्मळ पर्याय थाय छे एनो भेद (भेदज्ञान) वर्ते छे, अने ए रीते ते केवळ रागनो ज्ञाता-द्रष्टा रहे छे. साथे रहेवुं ज्ञान जाणे छे के पर्याय अपेक्षाए राग मारामां छे. आम सत्यार्थ द्रष्टि द्वारा धर्मी पुरुष पोताना जीवनने टकावी राखे छे, आ अनेकान्तनुं फळ छे.
प्रश्नः– ज्ञानी पर्यायमां दुःखने वेदे नहि, दुःखने जाणे अने वेदे एम जो कहो तो ज्ञाताद्रष्टापणुं क्यां रह्युं?
उत्तरः– दुःखने जाणे कहो के वेदे कहो-एक ज वात छे. दुःखने दुःखरूपे जाणे-वेदे नहि तो दुःख क्यां आव्युं? एकलो आनंद आव्यो. पण धर्मीने आनंदनी साथे ज दुःखनुं पण वेदन छे. आ दुःख छे ए पोते ज वेदन छे. एक पर्यायमां धर्मीने आनंद अने दुःख बन्नेनुं वेदन छे. आम न मानवामां आवे तो वस्तु सिद्ध नहि थाय. एने दुःख-दोष छे एनो ज्ञाता-द्दष्टा कहीए ए तो द्रव्यद्रष्टिथी वात छे, पण ज्ञान अपेक्षाए ज्ञान (आत्मा) दोष-दुःखने वेदे छे. दोष शुं कांई अद्धर (बहार) थाय छे? ना; तो दोषनुं- दुःखनुं वेदन छे.
प्रश्नः– ज्ञानी रागने-दुःखने जाणे छे, तो ते ज्ञाता छे के भोक्ता छे? उत्तरः– ज्ञाताय छे ने भोक्ताय छे. ते आ रीते -स्वभावनी द्रष्टिए ते ज्ञाता छे, कर्ता-भोक्ता नथी; पण पर्यायनुं ज्ञान करवानी अपेक्षाए ते कर्ता-भोक्ता छे, वेदक छे. आम जो न स्वीकारवामां आवे तो दुःखनुं वेदन परद्रव्यने छे एम (आपत्ति) आवशे. ज्ञानीने कर्मधारा छे एनो अर्थ शुं थयो? के पर्यायना वेदननी अपेक्षा तेने दुःखनुं वेदन छे. आम न माने ए एकान्त छे. आवो मारग! कोईने थाय के व्रत पाळवां, ने दया करवी ने विधवाओनां आंसु लूछवां, दीन-दुःखियाने भोजन-वस्त्र देवां एनी वात तो करता नथी. एवी वात तो भाई! अन्यमतमां पण खूब आवे छे, पण ए तो बधो राग छे बापु! एनाथी धर्म थाय एम माने ए तो मूढपणुं छे. लोकोने कांई खबर न मळे अने परमां ने परमां रोकाई रहे, पण ए तो जीवननो घात करवापणुं छे; केमके परनां काम आत्मा त्रणकाळमां पण करी शकतो नथी. समजाणुं कांई....?