Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३८६ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१०

तत्-अतत्, एक-अनेक-एम चार बोल थया. हवे पांचमो बोलः- ‘ज्यारे आ ज्ञानमात्र भाव, जाणवामां आवतां एवां परद्रव्योना परिणमनने लीधे ज्ञातृद्रव्यने परद्रव्यपणे मानीने -अंगीकार करीने नाश पामे छे, त्यारे (ते ज्ञानमात्र भावनुं) स्वद्रव्यथी सत्पणुं प्रकाशतो थको अनेकान्त ज तेने जिवाडे छे- नाश पामवा देतो नथी.’

शुं कहे छे? के आ ज्ञानस्वरूप आत्मवस्तु, एना ज्ञानमां शरीरादि परद्रव्यमय चीजो जाणवामां आवतां, पोताथी भिन्न ते अनंता द्रव्यो पर छे एम न मानतां ते हुं छुं एम मानीने निज ज्ञातृद्रव्यने परद्रव्यपणे अंगीकार करीने पोतानो नाश करे छे. अहा! शरीर, वाणी, कर्म ईत्यादि परद्रव्यने जाणवापणे थयो ते जाणनार हुं छुं एम न मानतां परद्रव्यनुं परिणमन जे जाणवामां आव्युं ते हुं छुं एम पोताने परद्रव्यरूप करीने पोतानो अभाव-नाश करे छे. नाश करे छे एटले वस्तु नाश पामे छे एम नहि. वस्तु तो जेवी ने तेवी ध्रुवपणे छे, पण मिथ्याश्रद्धान वडे ते मिथ्यात्वने सेवे छे, ने दुःखने अनुभवे छे.

आ द्रव्य-क्षेत्र-काळ-भाव पैकी पहेलो द्रव्यनो बोल चाले छे. शुं कहे छे? के परद्रव्यना शरीरादिरूप परिणमनने जाणवाना काळे अज्ञानीनुं लक्ष पर उपर होय छे. एटले परद्रव्यनी शरीरादि जे जे दशाओ थाय ते हुं छुं अर्थात् परद्रव्य हुं छुं एम अंगीकार करीने ते पोताना स्वद्रव्यनो-ज्ञातृद्रव्यनो लोप करे छे, ईन्कार करे छे. वास्तवमां जे परनुं परिणमन छे ते पररूप छे, आत्मरूप नथी; ने तेनुं पोतामां ज्ञान जे थाय ते पोतानुं छे, पोते छे. पण एम न मानतां अज्ञानी जीव आ परद्रव्यनुं परिणमन छे ते हुं छुं अर्थात् एनाथी हुं छुं एम अंगीकार करीने, स्व-परने एक करतो थको स्वनो नाश करे छे. समजाय छे कांई......?

अनादिथी जीवने परद्रव्यनुं लक्ष छे, स्वद्रव्यनुं लक्ष नथी. एटले ते परनी हयातीमां पोतानी हयाती भाळे छे. पैसा विना न चाले, अन्नपाणी विना न चाले, मकान विना न चाले-एम परथी ज मारुं जीवन छे एम ते माने छे. मूढ छे ने! स्वद्रव्यपणे पोते अनादि-अनंत सत् होवा छतां, एने लक्ष्य अने ध्येय न बनावतां परने लक्ष्य अने ध्येय बनावी पोताने परद्रव्यरूप करे छे अने ए रीते पोतानो - स्वद्रव्यनो अभाव करे छे, अर्थात् स्वानुभूति करतो नथी.

त्यारे धर्मी पुरुष, हुं एक आत्मा-ज्ञातृद्रव्य मारा स्वद्रव्यपणे सत् छुं, मने परद्रव्यथी शुं काम छे? -एम जाणे-माने छे अने अंतर्मुख थई पोताना सत्ने अनुभवे छे. अहा! मारा स्वद्रव्यथी हुं छुं एम स्वद्रव्यथी सत्पणुं प्रकाशतो अर्थात् स्वसत्तामां पोतानी द्रष्टि स्थापतो ज्ञानी पुरुष अनेकान्त तत्त्वनो आदर करीने पोताने जिवाडे छे. अहा! अनेकान्तनो आवो अलौकिक महिमा छे.