भाई! आमां तो मिथ्यात्वनो नाश अने सम्यक्त्वनी प्राप्ति केम थाय एनी वात छे. ज्यां सुधी हुं स्वद्रव्यथी छुं, ने परद्रव्यथी नथी एवुं भेदज्ञान न करे त्यां सुधी सम्यग्दर्शन अने धर्म थवां संभवित नथी. अहा! जाणनारने जाण्या-ओळख्या विना कोई व्रत-तप करीने सूकाई जाय तोय शुं? ए तो बधो राग छे बापा! एनाथी समकिते नहि ने धर्मेय नहि. वास्तवमां परथी ने रागथी निरपेक्ष पूरण ज्ञानानंदस्वरूपे पोतानुं होवापणुं छे एम स्वसत्तानो स्वाभिमुख थई स्वीकार करे एनुं नाम सम्यग्दर्शन छे अने ए प्रथम धर्म छे. आ सिवाय तो अज्ञानी परमां पोतानी हयाती भेळवी दईने पोताने मारी नाखे छे, नष्ट करे छे. समजाणुं कांई.....?
हवे छठ्ठो बोलः- ‘वळी ज्यारे ते ज्ञानमात्र भाव “ सर्व द्रव्यो हुं ज छुं (अर्थात् सर्व द्रव्यो आत्मा ज छे) ” एम परद्रव्यने ज्ञातृद्रव्यपणे मानीने-अंगीकार करीने पोतानो नाश करे छे, त्यारे (ते ज्ञानमात्र भावनुं) परद्रव्यथी असत्पणुं प्रकाशतो थको (अर्थात् परद्रव्यरूपे आत्मा नथी एम प्रगट करतो थको) अनेकान्त ज तेने पोतानो नाश करवा देतो नथी.’
जुओ, पांचमा बोलमां स्वद्रव्यथी सत्पणानी वात हती, अने अहीं छठ्ठा बोलमां परद्रव्यथी असत्पणानी वात छे. वेदांत आदि माने छे ने के- बधा आत्माओ-बधुं जगत एक ज छे. आवी मान्यतावाळा जीवो, अहीं कहे छे, पोतानो नाश करे छे, अर्थात् मिथ्याद्रष्टि छे. एवा जीवोने भगवाने पाखंडी कह्या छे, अने एना मतने पाखंड कह्यो छे.
बाळपणमां माबापनो आधार, भणवामां मास्तरनो आधार, धर्ममां देव-गुरुनो आधार एम लोको माने छे ने! पण वास्तवमां कोईने कोईनो आधार नथी. भगवान आत्मा पोताथी सत् ने बधा परद्रव्योथी असत् छे. अरे भाई! जेनाथी तुं असत् छे, जेनाथी तुं छो नहि तेनो शुं आधार? भगवान! तुं ताराथी छो ने परद्रव्यने लईने त्रणकाळमां नथी. आ धारणानी वात नहि बापु! आ तो अंतरमां बेसाडवानी वात छे. परद्रव्योरूप ज्ञेयोथी, शरीर-मन-वाणीथी, देवथी, गुरुथी, शास्त्रथी-हुं त्रिकाळ असत् छुं ए अंतरमां बेसाडवानी वात छे. समजाणुं कांई....? जेओ आ परद्रव्यो हुं छुं एम परद्रव्योने पोतास्वरूप करे छे तेओ परद्रव्यमां भळी जईने पोतानी चैतन्यसत्तानो नाश करे छे; तेओ मूढ छे, अज्ञानी छे, आत्मघाती छे.
अहा! परद्रव्योथी हुं सदाय असत् छुं एम परद्रव्यथी असत्पणुं प्रकाशतो थको- परवस्तुपणे आत्मा नथी एम प्रगट करतो थको अनेकान्त ज तेने पोतानो नाश थवा देतो नथी. जुओ, आ अनेकान्त! स्वपणे त्रिकाळ सत् छुं ने परपणे त्रिकाळ असत् छुं- एम अस्ति-नास्तिरूप अनेकान्त छे, अने एनुं फळ स्व-परनुं भेदविज्ञान छे. निश्चयथी पण धर्म थाय ने व्यवहारथी पण धर्म थाय एम लोको अनेकान्त कहे