Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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३८८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० छे ने! पण बापु! ए तो फुदडीवाद छे. एमां निश्चय-व्यवहार बे भिन्न न रह्या. निश्चयथी धर्म थाय, ने व्यवहारथी न थाय एनुं नाम अनेकान्त छे, अने ए भेदविज्ञान छे.

आत्मा स्वद्रव्यथी सत् छे, ने परद्रव्यथी असत् छे. आम होवाथी कोई परद्रव्य वा ईश्वर एनो कर्ता के उत्पादक छे नहि. बापु! आ परम सत्यने पहोंचवुं महा कठण छे. अनंतकाळमां एणे आ लक्षमां लीधुं नथी. (एम के हमणां दाव छे तो यथार्थ लक्ष कर).

हवे सातमो बोलः- ‘ज्यारे आ ज्ञानमात्र भाव परक्षेत्रगत (-परक्षेत्रे रहेला) ज्ञेय पदार्थोना परिणमनने लीधे परक्षेत्रथी ज्ञानने सत् मानीने-अंगीकार करीने नाश पामे छे, त्यारे (ते ज्ञानमात्र भावनुं) स्वक्षेत्रथी अस्तित्व प्रकाशतो थको अनेकान्त ज तेने जिवाडे छे-नाश पामवा देतो नथी.’

शुं कीधुं? आ ज्ञानमात्र भाव स्वक्षेत्रमां छे, ने शरीर-मन-वाणी बधां परक्षेत्र - गत-परक्षेत्रे रहेलां छे. ते परक्षेत्रगत ज्ञेय पदार्थोना परिणमनने लीधे परक्षेत्रथी मारुं ज्ञान छे, परक्षेत्रथी मारुं क्षेत्र छे एम मानीने अज्ञानी स्वक्षेत्रनो नाश करे छे.

रहेवा-सूवानुं सारुं मकान होय, सारुं क्षेत्र होय, उगमणा-आथमणा बेय बाजुथी अजवाळां ने हवाथी भरेलुं होय, वच्चे ढोलियो (पलंग) पडयो होय- आवा लांबा- पहोळा मकानथी-परक्षेत्रथी मने ठीक पडे-आनंद आवे एम परक्षेत्रने लईने पोतानी हयाती माननार मूढ अज्ञानी छे, ते पोताना स्वक्षेत्रनो अर्थात् पोताना स्वरूपनो नाश करे छे.

त्यारे ज्ञानी-धर्मी पुरुष, असंख्य प्रदेशी पोतानुं स्वक्षेत्र एनाथी हुं सत् छुं ने परक्षेत्रथी मने कांई प्रयोजन नथी एम मानतो थको पोतानो नाश थवा देतो नथी. (शरीरगत) लोकप्रमाण चैतन्यना असंख्यात प्रदेश ते मारुं स्वक्षेत्र छे, एनाथी मारी हयाती छे, ए सिवाय बीजे क्यांय (परक्षेत्रमां) हुं नथी एम स्वक्षेत्रथी अस्तित्व प्रकाशतो अर्थात् स्वक्षेत्रमां ज ठरीठाम थतो ज्ञानी पुरुष अनेकान्त द्वारा पोताने जिवाडे छे अर्थात् पोताना वास्तविक जीवनने जीवे छे. आवी वात वीतरागमार्ग सिवाय बीजे क्यांय नथी.

प्रश्नः– हा, पण अमारे धर्म केम करवो ते वात करो ने? आवी झीणी वात शुं करो छो? (एम के आत्मा शरीर प्रमाण असंख्य प्रदेशी छे अने ते प्रदेशो लोकाकाश प्रमाण छे एनाथी (एवी वातथी) अमने शुं प्रयोजन छे?)

उत्तरः– भाई! ए ज तो मांडी छे. (धर्म केम थाय ए ज वात तो थाय छे). परक्षेत्रथी हुं छुं, परक्षेत्रथी मने चैन छे एवी मान्यता अधर्म छे, अने मारुं स्थान- रहेठाण असंख्य प्रदेशी स्वक्षेत्रमां छे एवी द्रष्टि थवी एनुं नाम धर्म छे.