Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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परिशिष्टः ३८९

त्यारे एक भाई कहेता हता के गिरनार ने सम्मेदशिखरजी जईए तो तो लाभ थाय ने? पूजामां आवे छे के - ‘एक वार वंदे जो कोई, ताके नरक-पशु गति नहि होई.’

उत्तरः– एक शुं लाख वार वंदे तोय एनाथी शुं? ए तो शुभभाव छे. एनाथी पुण्य बंधाशे, पण धर्म नहि थाय.

त्यारे कोई वळी कहे छे- शेत्रुंजयनुं क्षेत्र बहु सारुं, त्यां जाय एना भाव बहु सारा-उज्ज्वळ थाय छे.

अरे भाई! शुं ए भाव क्षेत्रने लईने थता हशे? एम बिलकुल नथी, केमके तारुं चैतन्यक्षेत्र ने एने अत्यंत भिन्नता छे; तुं ए परक्षेत्रथी असत् छो.

तो मोक्षमार्गप्रकाशकमां आवे छे के नारकीने क्षेत्रगत वेदना छे. आ केवी रीते छे? हा, कह्युं छे. पण ए तो व्यवहारनयनी कथनी बापु! एनो अर्थ शो? ए क्षेत्रनी वेदना छे के पोतानी वेदना छे? ए पोतानुं वेदन पोताना क्षेत्रमां छे के नारकीना क्षेत्रने लईने छे? भाई! चैतन्यना क्षेत्रमां-स्वक्षेत्रमां तो नरकना क्षेत्रनो अत्यंत अभाव छे. माटे परक्षेत्रने-नरकना क्षेत्रने लईने वेदना न होय. ते काळे मोहजन्य जे पोताना रागद्वेषना भाव पोताना क्षेत्रमां छे एनुं वेदन छे. (पोतानी पर्यायनुं वेदन छे). शास्त्रमां जे क्षेत्रगत वेदनानुं कथन छे ए तो संयोगथी-निमित्तथी करेलुं कथन छे. (निमित्तथी कथन करवानी एवी पद्धति छे). बाकी आत्मा परक्षेत्रने अडे ज छे क्यां के एना कारणे एने वेदन थाय? अरे! लोकोने अनादिथी एवो अध्यास छे के परक्षेत्रने- परचीजने ए वेदे छे. बापु! आ अध्यास-आ शल्य तारो नाश करे छे हों. ए (ए शल्य) वडे तने तारुं एकत्व- विभक्तपणुं भासतुं नथी. अहीं कहे छे-स्वक्षेत्र अने परक्षेत्र वच्चे अंदरथी प्रज्ञारूपी करवत मूक. जो, ज्ञानी स्वक्षेत्रमां ज हुं छुं परक्षेत्रथी नथी एम भेदविज्ञाननी कला अंतरमां विकसावीने स्वक्षेत्रमां निवास पामीने जीवन जीवी जाणे छे, सत्यार्थ जीवनने प्राप्त थाय छे.

हवे आठमो बोलः- ‘वळी ज्यारे ते ज्ञानमात्र भाव स्वक्षेत्रे होवाने (-रहेवाने, परिणमवाने) माटे, परक्षेत्रगत ज्ञेयोना आकारोना त्याग वडे (अर्थात् ज्ञानमां जे परक्षेत्रे रहेल ज्ञेयोना आकार आवे छे तेमनो त्याग करीने) ज्ञानने तुच्छ करतो थको पोतानो नाश करे छे, त्यारे स्वक्षेत्रे रहीने ज परक्षेत्रगत ज्ञेयोना आकारोरूपे परिणमवानो ज्ञाननो स्वभाव होवाथी (ते ज्ञानमात्र भावनुं) परक्षेत्रथी नास्तित्व प्रकाशतो थको अनेकान्त ज तेने पोतानो नाश करवा देतो नथी.’

जुओ, अज्ञानी जीवो एम माने छे के-जे ज्ञानमां परक्षेत्रना ज्ञेयाकारो जणाय छे तेने