३९०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-१० छोडी दउं तो मारा क्षेत्रमां हुं आवी रहुं, परंतु परक्षेत्रने जाणवुं ए तो ज्ञाननो स्वभाव छे. परक्षेत्रने जाणतां ज्ञानमां परक्षेत्रना आकारे जे ज्ञान थयुं ए तो जीवनुं स्वरूप छे. परक्षेत्रना ज्ञानपणे परिणमे ए तो ज्ञाननुं स्वरूप छे. एमां परक्षेत्र क्यां आव्युं छे? अने ज्ञान परक्षेत्रमां क्यां गयुं छे? तुं तो परक्षेत्रने जाणवाकाळे पण तारा स्वक्षेत्रमां बिराजमान छो ने प्रभु! पण अज्ञानीने एम छे के आ परक्षेत्रने जाणनार ज्ञानने छोडी दउं तो स्वक्षेत्रमां आवुं, तेथी आ रीते ते परक्षेत्रने जाणवाना त्याग वडे ज्ञानने तुच्छ करतो थको पोतानो नाश करे छे.
त्यारे स्वक्षेत्रमां रहीने परक्षेत्रगत ज्ञेयोना आकाररूपे परिणमवानो ज्ञाननो स्वभाव होवाथी अर्थात् स्वस्वरूपमां रहीने पर पदार्थोने जाणवानो आत्मानो स्वभाव होवाथी परक्षेत्रथी नास्तित्व प्रकाशतो-परक्षेत्र मारामां नथी, परक्षेत्रथी हुं नथी एम परथी पोतानुं नास्तित्व प्रगट करतो अनेकान्त ज तेनो नाश थवा देतो नथी. आथी विरुद्ध परक्षेत्रथी मारुं अस्तित्व छे, परक्षेत्रथी मने लाभ छे एम माननारा जूठा छे.
प्रश्नः– क्षेत्रथी कांई फेर नहि पडतो होय? समोसरणना क्षेत्रथी, महाविदेहक्षेत्रथी शुं कांई लाभ न थाय?
उत्तरः– अरे भाई! अनंतगुणधाम एवा स्वक्षेत्रमां ध्रुव चैतन्य-परमेश्वर विराजे छे, तेनी प्रीति ने रति कर तो लाभ थाय ने तो फेर पडे; बाकी परक्षेत्रथी कांई लाभ ते थाय, ने कांई फेर ना पडे.
जुओ, महाविदेहमां कोई संत-मुनिवर होय ने कोई दुश्मन-देव एने उपाडीने भरतक्षेत्रे मूकी जाय अने ते धर्मात्मा अहीं केवळज्ञान पामे. हवे एमां क्षेत्र क्यां नडयुं? अने कोई समोसरणमां बेसीने मिथ्याभाव सेवे तो क्षेत्रनो एने शुं लाभ थयो? भाई! लाभ-नुकशान तो अंतरंग परिणामथी छे, परक्षेत्रथी नथी. वास्तवमां परक्षेत्रथी तो एनी नास्ति ज छे.
पोते स्वक्षेत्रथी छे, ने परक्षेत्रथी नथी एम न मानतां बन्नेथीय छे एम माने ते पण भ्रमणामां छे. एवी मान्यतामां तो बधुं भेळसेळ-एक थई गयुं. वेदांतवाळा परक्षेत्रमां सर्वत्र व्यापक हुं अखंड छुं एम माने छे. ते खरेखर स्वक्षेत्रने चूकी गया छे. ज्ञानी-धर्मी पुरुष स्वक्षेत्रमां ज हुं सदाय छुं एम माने छे. सिद्धक्षेत्रमां रहेला सिद्ध भगवंतो पोतपोताना स्वक्षेत्रमां ज रहेला छे, तेओ परक्षेत्रमां रह्या नथी. ज्यां सिद्ध परमात्मा छे त्यां ते ज आकाशना क्षेत्रे बीजा अनंत निगोदना जीव छे, पण सौनुं- प्रत्येकनुं क्षेत्र जुदुं जुदुं ज छे, सौ स्वक्षेत्रमां ज छे. समजाणुं कांई.....?
नवमो काळनो बोलः- ‘ज्यारे आ ज्ञानमात्र भाव पूर्वालंबित पदार्थोना विनाशकाळे (-पूर्वे जेमनुं आलंबन कर्युं हतुं एवा ज्ञेय पदार्थोना विनाश वखते) ज्ञाननुं