२२२ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११ करतां,...’
जोयुं? अनादिकाळथी मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान अने मिथ्याचारित्रथी जीव स्वरूपथी भ्रष्ट थयो छे. कर्मने लईने भ्रष्ट थयो छे एम लोको कहे छे ने? पण एम छे नहि. अहा! ‘अपने को आप भूल के हेरान हो गया’; पोतानी चीजने पोते भूली गयो अने विपरीत मानी लीधुं, तेथी ते स्वरूपथी च्युत थयो छे. अहाहा...! पोते चिदानंदघन प्रभु अंदर छे, आनंदनुं वास्तु-घर पोते छे-तेने भूलीने ते निजघरथी भ्रष्ट थयो छे. भजनमां आवे छे ने के-
परघर भ्रमत बहुत दिन बीते, नाम अनेक धराये;
हम तो कबहूँ न निजघर आये.
हुं महंत छुं, बावाजी छुं, संन्यासी छुं, त्यागी छुं, व्रती छुं, साधु छुं-एम अनेक नाम धारण कीधां, पण एमां शुं आव्युं? ए तो बधां परघर बापु! एमां जे राजी थाय छे ए तो स्वरूपथी च्युत छे.
अहा! अज्ञान ज परतंत्रता ने परतंत्रतानुं कारण छे; कर्मने लईने परतंत्रता थई छे एम नथी. ‘कर्म बिचारे कौन? भूल मेरी अधिकाई.’ पोतानी विपरीत श्रद्धा, विपरीत ज्ञान ने विपरीत आचरण वडे पोते स्वस्वरूपथी च्युत थयो छे. विपरीत श्रद्धान वडे परने आधीन थयो तेथी पराधीन छे, पर-कर्मे आधीन कर्यो छे एम छे नहि. कर्म तो बिचारां जड छे, ते शुं करे? अरे भगवान! तारी भूल तुं बीजा पर नाखी दे छे! आ तो अनीति छे. अरे, पण एने आवी कर्म पर ढोळवानी अनादिथी टेव पडी गई छे. ओहो...! अहीं तो स्वतंत्रताना ढंढेरा पीटया छे. कर्म भिन्न अने तुंय भिन्न प्रभु छो. परंतु-
जेम लोकमां माने छे के अमने इश्वरनो सहारो छे, तेम जैनमां कोई अज्ञानी जीवो एम माने छे के अमने कर्मनो सहारो छे, कर्म मारग आपे तो धर्म थाय. अर्थात् अज्ञानीओने कर्म इश्वर थई पडयो छे. अरे प्रभु! तने सहाय करे एवो कर्ता इश्वर छे ज कयां? तारो इश्वर तुं छो. साधकदशा अने साध्यदशा-बन्ने रूपे परिणमनारो तुं ज तारो इश्वर छो. बीजो इश्वर तारुं करे ए तो केवळ (जूठी) कल्पना छे. बीजो (कर्म वगेरे) तो ताराथी अन्य छे, ते तारो इश्वर केम थाय? अर्थात् ते तारुं शुं करे? कांई ज न करे. कर्म तारुं कांई ज ना करे. समजाय छे कांई...?
अहाहा...! अखंड प्रतापथी युक्त स्वातंत्र्यथी शोभायमान एवो पूर्णानंदनो नाथ प्रभु पोते छे तेनी द्रष्टि नहि करता अनादिथी विकारनी द्रष्टि करीने तुं पोते ज पराधीन थयो छे. कोई बीजो-कर्म आदि-पराधीन करे छे एम संतोए, गणधरोए कह्युं ज नथी. प्रवचनसारमां नय अधिकारमां आवे छे के-‘आत्मद्रव्य इश्वरनये परतंत्रता भोगवनार छे, धावनी दुकाने धवडाववामां आवता मुसाफरना बाळकनी माफक.’ ल्यो, आम जीव पोतानी पर्यायमां पराधीन पोताना कारणे थाय छे. स्वतंत्रता भोगवे तेय पोताथी, ने पराधीनता भोगवे तेय पोताथी. अहाहा...! आ ते शुं टीका छे?
अनादिथी मिथ्यादर्शन-ज्ञान-चारित्र वडे जीव स्वरूपथी भ्रष्ट थयो छे एम कह्युं ने? मतलब के पुण्यभावमां उपादेय बुद्धि, अल्पज्ञदशामां पूर्णदशानी भ्रान्ति-अहाहा...! आवो जे मिथ्याभाव-विपरीत श्रद्धा-एने लईने जीव स्वरूपथी भ्रष्ट थयो छे. आ शरीर मारुं, ने पुण्य-पाप मारां, स्त्री-कुटुंब परिवार मारां-एवी जे परद्रव्य-परभावमां ममत्वबुद्धि छे ते मिथ्यादर्शन छे; शुद्ध चिन्मात्र हुं आत्मा छुं एम नहि मानतां हुं मलिन छुं, रागी छुं, पुण्य- पापवाळो छुं एवी मान्यता मिथ्यादर्शन छे; अने दया, दान, व्रत, तप, भक्ति इत्यादि व्यवहारनो जे शुभ विकल्प तेनाथी मने धर्म थाय छे एवी मान्यता पण मिथ्यादर्शन छे; शरीरादि परद्रव्यनी क्रिया हुं करुं एय मान्यता मिथ्यादर्शन छे. अहा! आम मिथ्यादर्शन वडे जीव अनादिथी, स्वस्वरूपथी भ्रष्ट थयो छे.
वळी पोते ज्ञानस्वरूप छे तेनुं ज्ञान अने तेनो स्वीकार नहि करतां जे पोताना स्वरूपमां नथी एवां देह, मन, वाणी, इन्द्रिय अने पुण्य-पापना भाव-तेनुं ज्ञान करवामां रोकाय ते मिथ्याज्ञान छे. आत्मज्ञान विना, स्वस्वरूपना ज्ञान विना कदाचित् अगियार अंग अने नवपूर्वनुं ज्ञान थई जाय तोय शुं? आत्मज्ञान विना ए कांई चीज नथी.
अहा! आवा अज्ञान-मिथ्याज्ञान वडे जीव स्वस्वरूपथी भ्रष्ट थयो छे.
तथा स्वस्वरूपमां-एक ज्ञायकभावमां लीन थईने न रहेतां शुभाशुभभावमां लीन थईने रहेवुं ते मिथ्याचारित्र