जेम नाळियेरनो गोळो, उपरनां छालां, अंदरनी काचली अने गोळा उपरनी रातडथी भिन्न छे, तेम भगवान आत्मा छालां समान शरीर, कर्मना रजकणरूप काचली, अने पुण्य-पापना भावरूप रातडथी भिन्न छे, अने पोतानी अनंत शक्तिओथी अभिन्न छे. अहाहा...! आवी पोतानी चीज छे तेनी सन्मुख थई अंतर-एकाग्र थवाथी साधकदशारूप निर्मळ रत्नत्रयनी दशा प्रगट थाय छे ते उपाय छे. अहाहा...! आनंदकंद प्रभु पोते छे एना सन्मुखनी द्रष्टि-ज्ञान अने रमणता ते साधकदशानुं परिणमन छे, अने ते उपाय छे, अने आत्मानी पूर्ण निर्मळ दशानी प्राप्ति थवी ते मोक्षदशा-उपेय छे. आ मोक्षमार्गनी दशा अने मोक्षदशा-बन्ने रूपे आत्मा ज पोते परिणमे छे, राग के निमित्तने लईने ते दशा थाय छे एम छे नहि.
अरे, लोकोने आनो अभ्यास नहि ने आखो दि’ बायडी-छोकरांनुं करवामां ने पैसा रळवामां गुंचाई रहे, पण भाई, कोनी बायडी, ने कोनां छोकरां? तत्संबंधी रागेय तारी चीज नथी पछी बायडी-छोकरां तारां कयांथी आव्यां? ए बधी तो अत्यंत भिन्न चीज बापु! एमां तुं सलवाई पडयो छो ते तारुं महान अहित छे. अहीं कहे छे-प्रभु! सांभळ. तारुं हित करनारोय तुं, हितनो उपाये तुं अने हितरूप पूर्ण दशाय तुं छो. अहाहा...! अंदर ज्ञान ने आनंदनी लक्ष्मीरूप भगवान प्रभु तुं छो, पछी तारे बीजी चीजथी शुं प्रयोजन छे? माटे त्यांथी खसी एक वार अंतर्मुख था, तने ज्ञान ने आनंदनी अपूर्व दशा प्रगट थशे. आ उपाय छे, अने ते प्रथम चोथे गुणस्थाने प्रगट थाय छे. आ सिवाय बधुं थोथां छे.
अहाहा...! भगवान आत्मामां एक अभाव गुण छे. रागना-विभावना अभाव स्वभावे निर्मळ परिणमे एवो भगवान! तारो आ अभाव स्वभाव छे. त्रिकाळी शुद्ध ज्ञायक द्रव्यनो आश्रय करे तेने शक्तिनुं परिणमन प्रगट थाय छे. आ उपाय छे. आमां परनी अपेक्षा-गरज राखवी पडे एवो आत्मा पांगळो नथी. माटे हे भाई! परनी अपेक्षा छोडी स्वसन्मुख था, स्व-आश्रय कर. स्व-आश्रये ज साधकदशा, ने स्व-आश्रये ज सिद्धदशा प्रगट थाय छे.
जेम ताव देतां सोनानी १२, १३, १४ वला शुद्धता थाय ते अपूर्ण शुद्ध दशा छे, अने परम प्रकर्षरूप १६वला थाय ते तेनी पूर्ण शुद्ध दशा छे, तेम स्व-आश्रये परिणत आत्मा अल्प-अपूर्ण शुद्ध परिणमे ते साधक दशा छे, पूर्ण शुद्ध परिणमे ते साध्य दशा छे. साध्यदशा छे ते परम मोक्षदशा, सिद्धदशा छे; ने साधकदशा ते मोक्षमार्ग छे. तेने संवर-निर्जरा कहो, साधकभाव कहो, के उपाय कहो-बधुं एक ज छे. साधक-साध्यदशा बन्ने स्व-आश्रयमां ज समाय छे. स्व-आश्रय सिवाय बाकी बधुं थोथां ज छे. समजाणुं कांई...?
अरेरे! संसारमां भमतां-भमतां अनंतकाळमां ए अनंत वार नग्न दिगंबर साधु थयो, नग्न रह्यो, जंगलमां वास कर्यो, मौन रह्यो ने व्रत-समिति पाळ्यां, पण स्व-आश्रय कर्यो नहि तो एमां एणे शुं कर्युं? स्व-आश्रये आत्मज्ञान कर्या विना बधुं ज थोथां छे बापु! एटले तो कह्युं छे के-
अहा! रागना विकल्पथी छूटी पोतानो विज्ञानघनस्वभावी आत्मा छे तेमां लीनता करवी ते साधुदशा छे, ने ते ज उपाय छे. आ सिवाय तो बधुं लोकरंजन छे, मार्ग नथी.
श्रीमद्ना एक पत्रमां आवे छे के-जगतने रूडुं देखाडवा अने जगतथी राजी थवानो एणे प्रयत्न कर्यो छे, परंतु पोतानुं रूडुं केम थाय ए प्रयत्न एणे कदीय कर्यो नथी. लोको सारो कहे ने प्रशंसा करे तो हुं मोटो, ने तो हुं समाजमां कंईक अधिक. पण बापु! एमां शुं छे? ए तो बधुं धूळ छे. अहा! बीजाथी मारामां अधिकता-विशेषता छे ए मान्यता ज मूढपणुं छे. लोको अभिनंदननुं पूंछडुं आपे तोय एमां शुं छे? एमां मग्न थवुं-फूलाई जवुं ए तो साचे ज पूंछडुं नाम ढोरनी दशा छे.
अहीं तो पोते ज प्रभु छे. ते पोते पोताना स्वभावनी द्रष्टि करी पोताने अभिनंदन करे ते अभिनंदन छे. दुनिया जाणे न जाणे, पोते पोताना अतीन्द्रिय आनंदस्वरूपने अनुभवे ते अभिनंदन. कोई न जाणे तेथी शुं? आज सुधी अनंता सिद्ध थया; अत्यारे तेमनां नाम सुद्धां कोई न जाणे तेथी शुं? निजानंदरसलीन तेओ तो सदाय पोताथी अभिनंदित छे. समजाणुं कांई...?
हवे कहे छे-‘माटे, अनादि काळथी मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र वडे स्वरूपथी च्युत होवाने लीधे संसारमां भ्रमण