२२०ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
‘आत्मवस्तुने ज्ञानमात्रपणुं होवा छतां पण तेने उपाय-उपेयभाव (उपाय-उपेयपणुं) छे ज; कारण के ते एक होवा छतां पोते साधक रूपे अने सिद्ध रूपे एम बन्ने रूपे परिणमे छे. तेमां जे साधक रूप छे ते उपाय छे अने जे सिद्ध रूप छे ते उपेय छे.
जुओ, शुं कहे छे? के भगवान आत्मा त्रिकाळ एक ज्ञायकस्वरूप, ज्ञाननो पिंड प्रज्ञा ब्रह्मस्वरूप प्रभु छे. अहाहा...! ज्ञानमात्र वस्तु आत्मा त्रिकाळ छे, छतां तेनी पर्यायमां उपाय-उपेयभाव छे ज. अहाहा...! वस्तुपणे आत्मा नित्य ज्ञानमात्र होवा छतां एनी पर्यायमां साधकपणुं-मोक्षमार्ग अने सिद्धपणुं अर्थात् मोक्ष-एवा बे भाव छे ज; केमके द्रव्यरूपथी एक होवा छतां पर्यायरूपथी पोते साधकरूपे अने सिद्धरूपे एम बन्ने रूपे क्रमथी परिणमे छे. एमां जे साधकरूप परिणमन छे ते उपाय छे अने सिद्धरूप परिणमन ते उपेय छे; अर्थात् प्राप्त करवा योग्य मोक्ष ते उपेय छे, अने जेना वडे प्राप्त कराय ते मोक्षमार्ग उपाय छे. समजाणुं कांई...?
जुओ, साधकपणुं अने सिद्धपणुं ए बे आत्माना परिणाम छे, पर्याय छे. ज्ञानस्वभावनी द्रष्टि अने रमणता थये जे सम्यग्दर्शन-ज्ञान-चारित्ररूप शुद्ध रत्नत्रयनी वीतरागी दशा प्रगट थाय छे ते साधक दशा छे, ते साधकदशारूपे पोते ज परिणमे छे. अने केवळज्ञान थईने सिद्धरूप जे दशा थाय छे ते रूपे पण पोते ज परिणमे छे. एमां बहारनां साधनोनी एने गरज-अपेक्षा नथी. बहारमां व्यवहार सारो सुधारे तो साधक दशा प्रगट थाय एम नथी. जोके मोक्षमार्गीने बहारमां व्यवहार सारो-यथार्थ ज होय छे, पण एनाथी अंतरनी साधकदशा प्रगट थाय छे एम नथी. भाई, दया, दान, व्रत, भक्ति इत्यादि बधुं छे ए तो रागनी वृत्तिनुं उत्थान छे, ए रागनी वृत्तिना सहारे अंदर आत्मानी निर्मळ वीतरागी साधकदशा थाय एम त्रणकाळमां छे नहि.
अरेरे! शुं थाय? अनादिकाळथी पोतानी चैतन्यवस्तुनी महत्ता ज एने भासी नथी, अने तेथी निज स्वभावने भूली दया, दान, व्रत, तप, भक्ति, पूजा इत्यादि करतां करतां मने साधकपणुं-सम्यग्दर्शनादि थशे एवी (मिथ्या) मान्यता वडे ते अज्ञानी जीव टेवाई गयो छे, ने घेराई गयो छे. अहा! अंदर सच्चिदानंदस्वरूप-सत् नाम शाश्वत, चिद् नाम, ज्ञान, अने आनंदस्वरूप-पोते त्रिकाळ होवा छतां तेने भूलीने हुं मनुष्य छुं, हुं पुण्यवाळो छुं, हुं रागी छुं ने अल्पज्ञ छुं एवी जे पर्यायबुद्धि छे ते भ्रम-मिथ्यात्वदशा छे. अहाहा...! अंदर आनंदनो समुद्र पोते होवा छतां मारो आनंद विषयोमांथी आवे छे एम मान्युं छे ते मिथ्यात्व छे, मिथ्यात्व एटले दीर्धकाळ पर्यंत चार गतिमां रझळावनारुं संसारनुं बीज छे.
अहा! आ मिथ्यात्वनो-भ्रांतिनो नाश करवानो उपाय शुद्ध चैतन्यनां द्रष्टि-ज्ञान अने रमणता छे; एनाथी अज्ञाननो नाश थईने साधकदशा प्रगट थाय छे, अने ते साधकदशारूप उपायथी उपेय एवी मोक्षदशानी प्राप्ति थाय छे. पोतामां अपूर्ण शुद्धदशानुं थवुं ते साधकभाव छे, ने पूर्ण शुद्धदशा ते साध्य-मोक्ष छे. त्रिकाळी शुद्ध द्रव्य छे ए तो आश्रयनो-आलंबननो विषय छे, ए मोक्षमार्ग के मोक्ष नथी, पण एना आश्रये मोक्षमार्ग अने मोक्षनी पर्यायो प्रगट थाय छे.
मोक्षमार्गथी मोक्षदशानी प्राप्ति थाय एम बोलाय खरुं, परंतु एम कहेवुं ए व्यवहार छे. खरेखर मोक्षनुं कारण तो कर्म-नोकर्मथी भिन्न एवो मोक्षस्वरूप निज आत्मा छे, केमके तेनो पूर्ण आश्रय थये मोक्ष प्रगट थाय छे. विशेष विचारतां मोक्षनी दशा जे प्रगट थाय ते ज मोक्षनुं कारण छे, अने ते ज मोक्षरूप कार्य छे.
अहाहा...! निर्मळानंदनो नाथ चैतन्यमूर्ति प्रभु हुं आत्मा छुं. मारी चीजमां देह-मन-वाणी नहि, कर्म- नोकर्म नहि, ने एक समयमां उत्पन्न थतो विकार पण नहि-एवो हुं अनंत शक्तिओथी भरपुर भरेलो भगवान आत्मा छुं. अहीं कहे छे-आवो आत्मा पोते साधकरूपे अने सिद्धरूपे पोताथी परिणमित थाय छे. साधकदशा-उपाय हो भले, पण एक समयनी पूर्ण आनंदनी दशा-मोक्षदशा-परम वीतरागी दशा-तेरूपे आत्मा स्वयं परिणमे छे, पूर्वमां उपाय छे माटे एनाथी उपेय-मोक्षदशा थई छे एम नहि. आवी सूक्ष्म वात भाई! हवे आमां व्यवहार (राग) कारण छे ए तो कयांय उडी गयुं. समजाय छे कांई...?