Pravachan Ratnakar-Gujarati (Devanagari transliteration).

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कळश-२६पः २१९

स्याद्वादन्यायने नहि ओळंगता थका ज्ञानस्वरूप थाय छे. गंभीर वात छे प्रभु! भगवान जिनदेवनो मार्ग-शुद्ध रत्नत्रयनो मार्ग स्याद्वाद न्यायथी सिद्ध छे अने तेथी ते स्याद्वादन्यायरूप छे. अहा! आवा जिनदेवना मार्गने- मोक्षमार्गने नहि ओळंगता थका सत्पुरुषो ज्ञानस्वरूप थाय छे अर्थात् परम अमृतमय एवा मोक्षपदने पामे छे. जुओ आ अनेकान्त-द्रष्टिनुं फळ! जिनमार्ग ने परम मोक्षपदनी प्राप्ति ए अनेकान्त-द्रष्टिनुं फळ छे.

बंध अधिकारमां आवे छे के ज्ञानस्वरूपी आत्मा रागने-व्यवहारने-बंधभावने करे ते एना स्वरूपमां नथी, निश्चयने रचे (स्वस्वभावभावे परिणमे) अने व्यवहारने-रागने न रचे-एवो ज भगवान आत्मानो स्वभाव छे, अने ते स्याद्वादन्यायथी सिद्ध छे. समजाय छे कांई...?

परिशिष्टनी शरुआतमां बे वात करी हतीः (१) स्याद्वाद (अर्थात् वस्तुनुं अनेकान्त स्वरूप) कहीशुं, ने (२) उपाय-उपेय कहीशुं. स्याद्वादमां शक्तिओनुं वर्णन कर्युं. हवे उपाय-उपेय-मार्ग ने मार्गनुं फळ ए विशे थोडुं कहेशे.

* टीका *

(आ रीते स्याद्वाद विषे कहीने, हवे आचार्यदेव उपाय-उपेयभाव विषे थोडुं कहे छे.) ‘हवे आनो (-ज्ञानमात्र आत्मवस्तुनो) उपाय-उपेयभाव विचारवामां आवे छे (अर्थात् आत्मवस्तु ज्ञानमात्र होवा छतां तेने उपायपणुं अने उपेयपणुं बन्ने कई रीते घटे छे ते विचारवामां आवे छे)ः

आम वस्तुने ज्ञानमात्रपणुं होवा छतां पण तेने उपाय-उपेयभाव (उपाय-उपेयपणुं) छे ज; कारण के ते एक होवा छतां पोते साधक रूपे अने सिद्ध रूपे एम बन्ने रूपे परिणमे छे. तेमां जे साधक रूप छे ते उपाय छे अने जे सिद्ध रूप छे ते उपेय छे. माटे, अनादि काळथी मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्र वडे (मिथ्यादर्शन, मिथ्याज्ञान अने मिथ्याचारित्र वडे) स्वरूपथी च्युत होवाने लीधे संसारमां भ्रमण करतां सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रना पाकना प्रकर्षनी परंपरा वडे अनुक्रमे स्वरूपमां आरोहण कराववामां आवता आ आत्माने, अंतर्मग्न जे निश्चय-सम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप भेदो ते-पणा वडे पोते साधक रूपे परिणमतुं, तथा परम प्रकर्षनी हदने पामेला रत्नत्रयनी अतिशयताथी प्रवर्तेलो जे सकळ कर्मनो क्षय तेनाथी प्रज्वलित (देदीप्यमान) थयेलो जे अस्खलित विमळ स्वभावभाव ते-पणा वडे पोते सिद्ध रूपे परिणमतुं एवुं एक ज ज्ञानमात्र उपाय- उपेयभाव साधे छे.

(भावार्थः– आ आत्मा अनादि काळथी मिथ्यादर्शनज्ञानचारित्रने लीधे संसारमां भमे छे. ते सुनिश्चळपणे ग्रहण करेलां व्यवहारसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी वृद्धिनी परंपरा वडे अनुक्रमे स्वरूपनो अनुभव ज्यारथी करे त्यारथी ज्ञान साधक रूपे परिणमे छे, कारण के ज्ञानमां निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्ररूप भेदो अंतर्भूत छे. निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी शरूआतथी मांडीने, स्वरूप-अनुभवनी वृद्धि करतां करतां ज्यां सुधी निश्चयसम्यग्दर्शनज्ञानचारित्रनी पूर्णताथी समस्त कर्मनो नाश थाय अर्थात् साक्षात् मोक्ष थाय त्यारे ज्ञान सिद्ध रूपे परिणमे छे, कारण के तेनो अस्खलित निर्मळ स्वभावभाव प्रगट देदीप्यमान थयो छे. आ रीते साधक रूपे अने सिद्ध रूपे-बन्ने रूपे परिणमतुं एक ज ज्ञान आत्मवस्तुने उपाय-उपेयपणुं साधे छे.)

आ रीते बन्नेमां (-उपायमां तेम ज उपेयमां-) ज्ञानमात्रनुं अनन्यपणुं छे अर्थात् अन्यपणुं नथी; माटे सदाय अस्खलित एक वस्तुनुं (-ज्ञानमात्र आत्मवस्तुनुं-) निष्कंप ग्रहण करवाथी, मुमुक्षुओने के जेमने अनादि संसारथी भूमिकानी प्राप्ति न थई होय तेमने पण, तत्क्षण ज भूमिकानी प्राप्ति थाय छे; पछी तेमां ज नित्य मस्ती करता ते मुमुक्षुओ-के जेओ पोताथी ज, क्रमरूप अने अक्रमरूप प्रवर्तता अनेक अंतनी (अनेक धर्मनी) मूर्तिओ छे तेओ-साधकभावथी उत्पन्न थती परम प्रकर्षनी कोटिरूप सिद्धिभावनुं भाजन थाय छे. परंतु जेमां अनेक अंत अर्थात् धर्म गर्भित छे एवा एक ज्ञानमात्र भावरूप आ भूमिने जेओ प्राप्त करता नथी, तेओ सदा अज्ञानी वर्तता थका, ज्ञानमात्र भावनुं स्वरूपथी अभवन अने पररूपथी भवन देखता (-श्रद्धता) थका, जाणता थका अने आचरता थका, मिथ्याद्रष्टि, मिथ्याज्ञानी अने मिथ्याचारित्री वर्तता थका, उपाय-उपेयभावथी अत्यंत भ्रष्ट वर्तता थका संसारमां परिभ्रमण ज करे छे.