२१८ः प्रवचन रत्नाकर भाग-११
भावार्थः– जे सत्पुरुषो अनेकांत साथे सुसंगत द्रष्टि वडे अनेकांतमय वस्तुस्थितिने देखे छे, तेओ ए रीते स्याद्वादनी शुद्धिने पामीने-जाणीने, जिनदेवना मार्गने-स्याद्वादन्यायने-नहि उल्लंघता थका, ज्ञानस्वरूप थाय छे. २६प.
‘इति वस्तु–तत्त्व–व्यवस्थितिम् नैकान्त–सङ्गत–दशा स्वयमेव प्रविलोकयन्तः’ आवी (अनेकान्तात्मक) वस्तुतत्त्वनी व्यवस्थितिने अनेकान्त-संगत (-अनेकान्त साथे सुसंगत, अनेकान्त साथे मेळवाळी) द्रष्टि वडे स्वयमेव देखता थका...’
जुओ, शुं कहे छे? के अनेकान्तात्मक-अनेक धर्मस्वरूप वस्तु भगवान आत्मा छे. अहा! आवी वस्तुतत्त्वनी व्यवस्थाने-द्रव्यपर्यायमय वस्तु व्यवस्थाने अनेकान्त साथे सुसंगत-मेळवाळी द्रष्टि वडे जेओ देखे छे, वास्तवमां तेओ यथार्थ द्रष्टिवाळा छे. द्रव्यनी द्रष्टि (द्रव्यद्रष्टि) आवा द्रव्यपर्यायस्वरूप वस्तुना यथार्थ ज्ञानपूर्वक होय छे. ‘स्वयमेव देखता थका’-एम कह्युं ने? मतलब के धर्मी सत्पुरुषो पोते ज पोताना ज्ञाननी निर्मळ दशामां जेवी अनेकान्तमय वस्तु छे तेवी अनेकान्तथी सुसंगत द्रष्टि वडे देखे छे. समजाणुं कांई...?
हवे कहे छे-अने ए रीते ‘स्याद्वाद–शुध्दिम् अधिकाम् अधिगम्य’ स्याद्वादनी अत्यंत शुद्धिने जाणीने, ‘जिन–नीतिम् अलङ्गयन्तः’ जिननीतिने (जिनेश्वरदेवना मार्गने) नहि उल्लंघता थका, ‘सन्तः ज्ञानीभवन्ति’ सत्पुरुषो ज्ञानस्वरूप थाय छे.
‘स्याद्वादनी अत्यंत शुद्धिने जाणीने’ एटले शुं? के जे प्रकारे वस्तु नित्य छे ते प्रकारे तेने नित्य जाणीने, तथा जे प्रकारे वस्तु अनित्य छे ते प्रकारे तेने अनित्य जाणीने, तेवी ज रीते वस्तु जे प्रकारे एक छे ते प्रकारे एक जाणीने तथा जे प्रकारे अनेक छे ते प्रकारे अनेक जाणीने;-आ प्रमाणे वस्तु नित्य-अनित्य, एक-अनेक, सत्-असत्, तत्-अतत् इत्यादि प्रकारे जेम छे तेम अपेक्षाथी यथार्थ जाणवी ते स्याद्वादनी अत्यंत शुद्धि छे-तेने जाणीने; अहाहा...! द्रव्यपर्यायस्वरूप वस्तु आत्मा छे तेने यथार्थ जाणीने, जिननीतिने अर्थात् भगवान जिनेश्वरदेवना मार्गने नहि उल्लंघता थका... , जुओ, सत्पुरुषो-संतो-भगवानना मार्गने ओळंगता नथी. अहाहा...! आम भगवानना मार्गने नहि ओळंगता थका, सत्पुरुषो ज्ञानस्वरूप थाय छे अर्थात् पूर्ण ज्ञानस्वरूपने-केवळज्ञानने पामे छे.
जुओ आ जिननीति! अहाहा...! जेवुं वस्तुस्वरूप छे तेवुं जाणवुं, जेवी वस्तु छे तेवी तेनी श्रद्धा करवी, अने स्वसन्मुख थईने वस्तु-आत्मद्रव्यमां ज रमणता करवी ते जिननीति नाम जिनमार्ग छे. संतो आवा मार्गने नहि ओळंगता थका, मार्गने ज अनुसरता थका, केवळज्ञानदशाने पामे छे. ल्यो, आ सिवाय बीजानुं कांई भलुं-बुरुं करवुं एवी आत्मानी शक्ति नथी.
प्रश्नः– तो सिद्ध भगवान शुं काम करे? उत्तरः– पोते ज्ञानस्वरूप थईने एकला आनंदने अनुभवे-भोगवे. भगवान अनंत सुख प्रगट थयुं तेने भोगवे बस.
प्रश्नः– आवा मोटा भगवान थईने कोईनुं कांई करे नहि? उत्तरः– ना कोईनुं कांई करे एवो आत्मस्वभाव ज नथी. हराम जो कोईनुं कांई करे, केमके कोईनुं कांई करवानो आत्मानो स्वभाव ज नथी. अहा! आवुं वस्तुस्वरूप छे तेनाथी विपरीत मानवुं ते जिननीति-जिनमार्ग नथी, पण अनीति छे; अहा! जिननीतिने जे ओळंगे छे ते मिथ्याद्रष्टि थाय छे ने घोर संसारमां परिभ्रमे छे. सत्पुरुषो जिननीतिने ओळंगता नथी; कोईनुं कांई करवा रोकाता नथी. समजाणुं कांई...?
‘जे सत्पुरुषो अनेकान्त साथे सुसंगत द्रष्टि वडे अनेकान्तमय वस्तुस्थितिने देखे छे, तेओ ए रीते स्याद्वादनी शुद्धिने पामीने-जाणीने, जिनदेवना मार्गने-स्याद्वादन्यायने-नहि उल्लंघता थका, ज्ञानस्वरूप थाय छे.’
अहाहा...! अनेकान्तमय वस्तुस्वरूप छे, ने स्याद्वाद तेनुं द्योतक छे. शुं कीधुं? स्याद्वाद, अनेकान्तमय वस्तुने यथार्थ प्रकाशे छे. अहीं कहे छे जे सत्पुरुषो अनेकान्त साथे सुसंगत-मेळवाळी द्रष्टि वडे आत्मवस्तुने देखे छे, तेओ ए रीते स्याद्वादनी शुद्धिने पामे छे, अर्थात् स्याद्वाद द्वारा वस्तुने यथार्थ प्रकाशे छे-देखे छे; अने ए रीते जिनदेवना मार्गने-